तबीयत Poetry (page 9)
हँसने में रोने की आदत कभी ऐसी तो न थी
एजाज़ उबैद
उम्मीद पर हमारी ये दुनिया खरी नहीं
डॉक्टर आज़म
कब तक फिरूंगा हाथ में कासा उठा के मैं
दिलावर अली आज़र
तेरी सूरत को देखता हूँ मैं
दाग़ देहलवी
कुछ लाग कुछ लगाव मोहब्बत में चाहिए
दाग़ देहलवी
होश आते ही हसीनों को क़यामत आई
दाग़ देहलवी
क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले
चरख़ चिन्योटी
क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले
चरख़ चिन्योटी
पछताओगे फिर हम से शरारत नहीं अच्छी
बेख़ुद देहलवी
मेरे हम-राह मिरे घर पे भी आफ़त आई
बेख़ुद देहलवी
हुआ जो वक़्फ़-ए-ग़म वो दिल किसी का हो नहीं सकता
बेख़ुद देहलवी
दिल अब उस दिल-शिकन के पास कहाँ
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
शम्अ भी इस सफ़ा से जलती है
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
देखी जो ज़ुल्फ़-ए-यार तबीअत सँभल गई
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ग़मगीं नहीं हूँ दहर में तो शाद भी नहीं
बहराम जी
वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले
ज़फ़र
गालियाँ तनख़्वाह ठहरी है अगर बट जाएगी
ज़फ़र
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
ज़फ़र
आतिश-ए-ख़ामोश
अज़ीज़ लखनवी
मेरे रोने पे ये हँसी कैसी
अज़ीज़ लखनवी
जी है बहुत उदास तबीअत हज़ीं बहुत
अज़ीज़ हामिद मदनी
दर-पेश नहीं नक़्ल-ए-मकानी कई दिन से
अज़हर नक़वी
उदास उदास तबीअ'त जो थी बहलने लगी
अज़हर इनायती
मैं समुंदर था मुझे चैन से रहने न दिया
अज़हर इनायती
सितम-दोस्त फ़िक्र-ए-अदावत कहाँ तक
आज़ाद अंसारी
हर्फ़ लर्ज़ां हैं कि होंटों पे वो आएँ कैसे?
अतीक़ असर
मेहमान
असरार-उल-हक़ मजाज़
बिजली हुई फ़ेल
असरार जामई
क्यूँ मुझ से गुरेज़ाँ है मैं तेरा मुक़द्दर हूँ
असलम महमूद
कुछ वो भी तबीअत का सुखी ऐसा नहीं है
आसिम वास्ती
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