ज़िम Poetry (page 4)

महफ़िल-ए-शब

अहमद नदीम क़ासमी

वो अपने ज़ोम में था बे-ख़बर रहा मुझ से

अहमद फ़राज़

चले थे यार बड़े ज़ोम में हवा की तरह

अहमद फ़राज़

दोस्ती का हाथ

अहमद फ़राज़

भली सी एक शक्ल थी

अहमद फ़राज़

सुकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ

अहमद फ़राज़

क़ामत को तेरे सर्व सनोबर नहीं कहा

अहमद फ़राज़

मिज़ाज हम से ज़ियादा जुदा न था उस का

अहमद फ़राज़

मैं तो मक़्तल में भी क़िस्मत का सिकंदर निकला

अहमद फ़राज़

चले थे यार बड़े ज़ोम में हवा की तरह

अहमद फ़राज़

दे के वो सारे इख़्तियार मुझे

अहमद अशफ़ाक़

खुली आँखों में दर आने से पहले

आफ़ताब अहमद

हम कि इक भेस लिए फिरते हैं

अबरार अहमद

सफ़ेद-पोश दरिंदों ने गुल खिलाए थे

अब्दुर्रहीम नश्तर

बजा कि लुत्फ़ है दुनिया में शोर करने का

अब्दुल अहद साज़

काग़ज़ क़लम दवात के अंदर रुक जाता है

अस्नाथ कंवल

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