जीवन Poetry (page 10)

अपना नफ़स नफ़स है कि शो'ला कहें जिसे

वाहिद प्रेमी

अपना नफ़स नफ़स है कि शो'ला कहें जिसे

वाहिद प्रेमी

आज फिर सर-ए-मक़्तल दे के ख़ुद लहू हम ने

वाहिद प्रेमी

उलझी थी जिन में एक ज़माने से ज़िंदगी

वहीदा नसीम

मिज़्गाँ पे आज यास के मोती बिखर गए

वहीदा नसीम

जिधर निगाह उठी खिंच गई नई दीवार

वहीद क़ुरैशी

हर एक लम्हा किया क़र्ज़ ज़िंदगी का अदा

वहीद अख़्तर

तवाना ख़ूबसूरत जिस्म

वहीद अख़्तर

पत्थरों का मुग़न्नी

वहीद अख़्तर

मौत की जुस्तुजू

वहीद अख़्तर

ज़बान-ए-ख़ल्क़ पे आया तो इक फ़साना हुआ

वहीद अख़्तर

अँधेरा इतना नहीं है कि कुछ दिखाई न दे

वहीद अख़्तर

वफ़ा की मंज़िलों को हम ने इस तरह सजा लिया

वफ़ा सिद्दीक़ी

बहुत उकता गया हूँ अपने जी से

विश्वनाथ दर्द

सुकूत-ए-शब सितारों से हवा जब बात करती है

विश्मा ख़ान विश्मा

करना है कार-ए-ख़ैर तो फिर सर न देखना

विश्मा ख़ान विश्मा

जुनूँ के बाब में अब के ये राएगानी हो

विपुल कुमार

इक समुंदर के हवाले सारे ख़त करता रहा

विलास पंडित मुसाफ़िर

इरादा तो नहीं है ख़ुद-कुशी का

विकास शर्मा राज़

सब के आगे नहीं बिखरना है

विकास शर्मा राज़

मुसाफ़िरों के लिए साज़गार थोड़ी है

विकास शर्मा राज़

जुनूँ की पैरवी से ख़ुश नहीं हूँ

विकास शर्मा राज़

किसी सूखे हुए शजर सा हूँ

विजय शर्मा अर्श

इश्क़ ने बरबाद कर दी ज़िंदगी हाए रे इश्क़

विजय अरुण

कार्बन-पेपर

वर्षा गोरछिया

बहुत दिनों में हम उन से जो हम-कलाम हुए

वारिस किरमानी

फ़सील-ए-रेग पर इतना भरोसा कर लिया तुम ने

वली मदनी

बहुत टूटा हूँ लेकिन हौसला ज़िंदा बहुत कुछ है

वली मदनी

कुछ तो मोहब्बतों की वफ़ाएँ निभाऊँ मैं

उषा भदोरिया

अँधेरी शब में चराग़-ए-रह-ए-वफ़ा देना

उषा भदोरिया

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