जीवन Poetry (page 8)

आते रहते हैं फ़लक से भी इशारे कुछ न कुछ

यासमीन हबीब

ज़ेहन का कुछ मुंतशिर तो हाल का ख़स्ता रहा

यासीन अफ़ज़ाल

रेत के इक शहर में आबाद हैं दर दर के लोग

यासीन अफ़ज़ाल

मसअलों की भीड़ में इंसाँ को तन्हा कर दिया

याक़ूब यावर

करम के इस दौर-ए-इम्तिहाँ से वो दौर-ए-मश्क़-ए-सितम ही अच्छा

याक़ूब उस्मानी

चाहती है आख़िर क्या आगही ख़ुदा-मालूम

याक़ूब उस्मानी

मिरे चारों तरफ़ एक आहनी दीवार क्यूँ है

याक़ूब तसव्वुर

क्या हुआ हम से जो दुनिया बद-गुमाँ होने लगी

याक़ूब आमिर

इक ख़ला सा है जिधर देखो इधर कुछ भी नहीं

याक़ूब आमिर

चंद घंटे शोर ओ ग़ुल की ज़िंदगी चारों तरफ़

याक़ूब आमिर

ख़ुदा गवाह

यहया अमजद

ठोकरें खिलवाईं क्या-क्या पा-ए-बे-ज़ंजीर ने

यगाना चंगेज़ी

अजब तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी हम ने

वज़ीर आग़ा

उड़ी जो गर्द तो इस ख़ाक-दाँ को पहचाना

वज़ीर आग़ा

अगर ख़ू-ए-तहम्मुल हो तो कोई ग़म नहीं होता

वासिफ़ देहलवी

डर मौत का न ख़ौफ़ किसी देवता का था

वसीम मीनाई

वह जानते ही नहीं

वसीम बरेलवी

ये है तो सब के लिए हो ये ज़िद हमारी है

वसीम बरेलवी

यही बज़्म-ए-ऐश होगी यही दौर-ए-जाम होगा

वसीम बरेलवी

तुम्हें ग़मों का समझना अगर न आएगा

वसीम बरेलवी

सिर्फ़ तेरा नाम ले कर रह गया

वसीम बरेलवी

सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ

वसीम बरेलवी

दुआ करो कि कोई प्यास नज़्र-ए-जाम न हो

वसीम बरेलवी

अंधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है

वसीम बरेलवी

मैं ज़िंदगी को लिए फिर रहा हूँ कब से 'वक़ार'

वक़ार मानवी

ख़ुशी दामन-कशाँ है दिल असीर-ए-ग़म है बरसों से

वक़ार मानवी

हमारी ज़िंदगी कहने की हद तक ज़िंदगी है बस

वक़ार मानवी

ग़रीब को हवस-ए-ज़िंदगी नहीं होती

वक़ार मानवी

मिरे वजूद को पामाल करना चाहता है

वक़ार मानवी

ख़ुशी दामन-कशाँ है दिल असीर-ए-ग़म है बरसों से

वक़ार मानवी

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