जीवन Poetry (page 26)

सर-ए-बज़्म मेरी नज़र से जब वो निगाह-ए-होश-रुबा मिली

शादाँ इंदौरी

ज़रा देखना ख़ाकसारी हमारी

शाद लखनवी

सुना हम को आते जो अंदर से बाहर

शाद लखनवी

ख़्वाह मुफ़्लिसी से निकल गया या तवंगरी से निकल गया

शाद बिलगवी

जफ़ा-शिआ'र भी हो कोई मेहरबाँ भी रहे

शाद बिलगवी

ये सिलसिले भी रिफ़ाक़त के कुछ अजीब से हैं

शबनम शकील

तन्हा खड़े हैं हम सर-ए-बाज़ार क्या करें

शबनम शकील

पी रहा है ज़िंदगी की धूप कितने प्यार से

शबनम नक़वी

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

ले के बे-शक हाथ में ख़ंजर चलो

शबाब ललित

बड़ी तलाश से मिलती है ज़िंदगी ऐ दोस्त

शानुल हक़ हक़्क़ी

समझ में ख़ाक ये जादूगरी नहीं आती

शानुल हक़ हक़्क़ी

कटती है आरज़ू के सहारे पे ज़िंदगी

शाद आरफ़ी

कहता है बाग़बान लिहाज़ा न चाहिए

शाद आरफ़ी

हमारी ग़ज़लों हमारे शेरों से तुम को ये आगही मिलेगी

शाद आरफ़ी

वक़्त ने इक नज़र जो डाली है

सीमान नवेद

मेहमाँ को घर में आए ज़माना गुज़र गया

सीमाब सुल्तानपुरी

मजबूर हूँ गुनाह किए जा रहा हूँ मैं

सीमाब बटालवी

सुबू पर जाम पर शीशे पे पैमाने पे क्या गुज़री

सीमाब अकबराबादी

शायद जगह नसीब हो उस गुल के हार में

सीमाब अकबराबादी

रोज़-ए-फ़िराक़ हर तरफ़ इक इंतिशार था

सीमाब अकबराबादी

जो उम्र तेरी तलब में गँवाए जाते हैं

सीमाब अकबराबादी

जो इंसाँ बारयाब-ए-पर्दा-ए-असरार हो जाए

सीमाब अकबराबादी

जहान-ए-रंग-ओ-बू में मुस्तक़िल तख़्लीक़-ए-मस्ती है

सीमाब अकबराबादी

बड़ी दिलचस्पियों से सुब्ह-ए-शाम-ए-ज़िंदगी होगी

सीमाब अकबराबादी

अफ़सोस गुज़र गई जवानी

सीमाब अकबराबादी

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