जीवन Poetry (page 28)
तुम थे तो हर इक दर्द तुम्हीं से था इबारत
सरफ़राज़ ख़ालिद
जिसे तू ने समझा है ज़िंदगी उसी इंक़लाब का नाम है
सरीर काबिरी
दर-ए-मय-कदा है खुला हुआ सर-ए-चर्ख़ आज घटा भी है
सरदार सोज़
अफ़्सोस क्या जो हम भी तुम्हारे नहीं रहे
सरदार सोज़
ये बात सच है कि वो ज़िंदगी नहीं मेरी
सदार आसिफ़
ये लफ़्ज़ लफ़्ज़ शोला-बयानी उसी की है
सदार आसिफ़
ये झूट है कि बिछड़ने का उस को ग़म भी नहीं
सदार आसिफ़
कभी कभी तू मुझे याद कर तो लेती है
सरदार अंजुम
चलेगी न ऐ दिल कोई घात हरगिज़
सरस्वती सरन कैफ़
क़र्ज़
सारा शगुफ़्ता
परिंदा कमरे में रह गया
सारा शगुफ़्ता
बदन से पूरी आँख है मेरी
सारा शगुफ़्ता
बस ऐ फ़लक नशात-ए-दिल का इंतिक़ाम हो चुका
साक़िब लखनवी
मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
साक़ी फ़ारुक़ी
तर्ग़ीब
साक़ी फ़ारुक़ी
मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
साक़ी फ़ारुक़ी
बाद-ए-निस्याँ है मिरा नाम बता दो कोई
साक़ी फ़ारुक़ी
करनी नहीं है दुनिया में इक दुश्मनी मुझे
संजीव आर्या
समुंदर की ख़ुश्बू
समीना राजा
इक उम्र की देर
समीना राजा
पत्थर की नींद सोती है बस्ती जगाइए
समद अंसारी
उदास चेहरे वाली ख़ूबसूरत लड़की के लिए एक नज़्म
सलमान सईद
राह मिलती है घर नहीं मिलता
सलमान सईद
ये तमन्ना है कि अब और तमन्ना न करें
सलमान अख़्तर
कहो तो आज बता दें तुम्हें हक़ीक़त भी
सलमान अख़्तर
ज़ब्त की हद से गुज़र कर ख़ार तो होना ही था
सलीम शुजाअ अंसारी
मुझे जब भी कभी तेरी कमी महसूस होती है
सलीम शुजाअ अंसारी
कभी मिली है जो फ़ुर्सत तो ये हिसाब किया
सलीम शुजाअ अंसारी
जब आसमान ज़मीं पर उतरने लगता है
सलीम शुजाअ अंसारी
आज शायद ज़िंदगी का फ़ल्सफ़ा समझा हूँ मैं
सलीम शुजाअ अंसारी
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