जीवन Poetry (page 29)

जब से उन की मेहरबानी हो गई

सलीम रज़ा रीवा

कही किसी से न रूदाद-ए-ज़िंदगी मैं ने

सालिक लखनवी

चाहा था ठोकरों में गुज़र जाए ज़िंदगी

सालिक लखनवी

वुसअ'त-ए-दामान-ए-दिल को ग़म तुम्हारा मिल गया

सालिक लखनवी

बढ़ते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद क़दम अज़्म-ए-सफ़र को क्या करूँ

सालिक लखनवी

ग़म-ए-हयात मिटाना है रो के देखते हैं

सलीम सिद्दीक़ी

जुदाई भी न होती ज़िंदगी भी सहल हो जाती

सलीम कौसर

सरासर नफ़ा था लेकिन ख़सारा जा रहा है

सलीम कौसर

मुलाक़ातों का ऐसा सिलसिला रक्खा है तुम ने

सलीम कौसर

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है

सलीम कौसर

कहीं तुम अपनी क़िस्मत का लिखा तब्दील कर लेते

सलीम कौसर

हर क़दम आगही की सम्त गया

सलीम फ़िगार

फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में शाख़ से पत्ता निकाल दे

सलीम फ़िगार

किस ने कहा कि मुझ को ये दुनिया नहीं पसंद

सलीम फ़राज़

कम रंज मौसम-ए-गुल-ए-तर ने नहीं दिया

सलीम फ़राज़

इक एक लफ़्ज़ में कई पहलू कहाँ से आए

सलीम फ़राज़

अभी मौजूद थी लेकिन अभी गुम हो गई है

सलीम फ़राज़

मुझ को सज़ा-ए-मौत का धोका दिया गया

सलीम अंसारी

खेल

सलीम अहमद

वो लोग भी हैं जो मौजों से डर गए होंगे

सलीम अहमद

'सलीम' दश्त-ए-तमन्ना में कौन है किस का

सलीम अहमद

मंज़िल-ए-बे-जहत की ख़ैर सई-ए-सफ़र है राएगाँ

सलीम अहमद

दिल के अंदर दर्द आँखों में नमी बन जाइए

सलीम अहमद

कटेगी कैसे गुल-ए-नौ की ज़िंदगी या-रब

सलाम संदेलवी

काश तुम समझ सकतीं ज़िंदगी में शाएर की ऐसे दिन भी आते हैं

सलाम मछली शहरी

ये धरती ख़ूब-सूरत है

सलाम मछली शहरी

तसलसुल

सलाम मछली शहरी

मुझे वो नज़्म लिखनी है

सलाम मछली शहरी

गुरेज़

सलाम मछली शहरी

अस्पताल

सलाम मछली शहरी

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