ज़ुल्फ़ Poetry (page 7)

चराग़-ए-मह सीं रौशन-तर है हुस्न-ए-बे-मिसाल उस का

सिराज औरंगाबादी

ऐ दिल-ए-बे-अदब उस यार की सौगंद न खा

सिराज औरंगाबादी

ऐ बाग़-ए-हया दिल की गिरह खोल सुख़न बोल

सिराज औरंगाबादी

अग़्यार छोड़ मुझ सें अगर यार होवेगा

सिराज औरंगाबादी

अगर कुछ होश हम रखते तो मस्ताने हुए होते

सिराज औरंगाबादी

शमीम-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार आए न आए

सिकंदर अली वज्द

शमीम ज़ुल्फ़-ए-यार आए न आए

सिकंदर अली वज्द

ख़ुदा करे कि नज़र कामयाब हो जाए

बाबू सि द्दीक़ निज़ामी

मिरे दिल की अब ऐ अश्क-ए-नदामत शुस्त-ओ-शू कर दे

श्याम सुंदर लाल बर्क़

ऐ रश्क-ए-महर कोई भी तुझ सा हसीं नहीं

श्याम सुंदर लाल बर्क़

मसअले का हल न निकला देर तक

श्याम सुन्दर नंदा नूर

तुम अपने मरीज़-ग़म-हिज्राँ की ख़बर लो

शऊर बलगिरामी

करता है रहम कौन किसी बे-गुनाह पर

शऊर बलगिरामी

जो शाना गेसू-ए-जानाँ में हम कभू करते

शऊर बलगिरामी

इस बज़्म में पाते नहीं दिल-सोज़ किसी को

शऊर बलगिरामी

दिल फड़क जाएगा वो शोख़ जो ख़ंदाँ होगा

शऊर बलगिरामी

ये कह कह के हम दिल को बहला रहे हैं

शोभा कुक्कल

यास की मंज़िल में तन्हाई थी और कुछ भी नहीं

शिव चरन दास गोयल ज़ब्त

कुछ अकेली नहीं मेरी क़िस्मत

शिबली नोमानी

क़िस्सा तो ज़ुल्फ़-ए-यार का तूल ओ तवील है

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है

ज़ौक़

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें

ज़ौक़

रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू

ज़ौक़

नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा

ज़ौक़

निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी

ज़ौक़

न खींचो आशिक़-तिश्ना-जिगर के तीर पहलू से

ज़ौक़

मार कर तीर जो वो दिलबर-ए-जानी माँगे

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे

ज़ौक़

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