विद्वान Poetry (page 15)

मौसम-ए-गुल है न दौर-जाम-ओ-सहबा रह गया

शफ़ीक़ जौनपुरी

कब से इस दुनिया को सरगर्म-ए-सफ़र पाता हूँ मैं

शफ़ीक़ जौनपुरी

राह-ए-दुश्वार में चलना सीखो

शायर फतहपुरी

गुल याद न अमवाज-ए-नसीम-ए-सहरी याद

शायर फतहपुरी

ज़रा देखना ख़ाकसारी हमारी

शाद लखनवी

शक्ल-ए-मिज़्गाँ न ख़ार की सी है

शाद लखनवी

हुई तो जा दिल में उस सनम की नमाज़ में सर झुका झुका कर

शाद लखनवी

देख कर रू-ए-सनम को न बहल जाऊँगा

शाद लखनवी

ये रात भयानक हिज्र की है काटेंगे बड़े आलाम से हम

शाद अज़ीमाबादी

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना

शाद अज़ीमाबादी

एक सितम और लाख अदाएँ उफ़ री जवानी हाए ज़माने

शाद अज़ीमाबादी

मुसाफ़िर सितारा

शब्बीर शाहिद

मय-ए-फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था

शब्बीर शाहिद

जुदा हो कर वो हम से है जुदा क्या

शायर लखनवी

ऐ दिल अब और कोई क़िस्सा-ए-दुनिया न सुना

शानुल हक़ हक़्क़ी

औरत

शाद आरफ़ी

जो भी अपनों से उलझता है वो कर क्या लेगा

शाद आरफ़ी

जब सबक़ दे उन्हें आईना ख़ुद-आराई का

सेहर इश्क़ाबादी

फ़रिश्ते भी पहुँच सकते नहीं वो है मकाँ अपना

सेहर इश्क़ाबादी

मज़ा जब है उसे बर्क़-ए-तजल्ला देखने वाले

सीमाब बटालवी

मैं इक शाइ'र हूँ असरार-ए-हक़ीक़त खोल सकता हूँ

सीमाब बटालवी

ज़ब्त से ना-आश्ना हम सब्र से बेगाना हम

सीमाब अकबराबादी

नसीम-ए-सुब्ह गुलशन में गुलों से खेलती होगी

सीमाब अकबराबादी

मेरी रिफ़अत पर जो हैराँ है तो हैरानी नहीं

सीमाब अकबराबादी

जो सालिक है तो अपने नफ़्स का इरफ़ान पैदा कर

सीमाब अकबराबादी

जरस है कारवान-ए-अहल-ए-आलम में फ़ुग़ाँ मेरी

सीमाब अकबराबादी

जाग और देख ज़रा आलम-ए-वीराँ मेरा

सीमाब अकबराबादी

इश्क़ ख़ुद माइल-ए-हिजाब है आज

सीमाब अकबराबादी

अंजाम हर इक शय का ब-जुज़ ख़ाक नहीं है

सीमाब अकबराबादी

आँख से टपका जो आँसू वो सितारा हो गया

सीमाब अकबराबादी

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