विद्वान Poetry (page 13)

तू ने ग़ारत किया घर बैठे घर इक आलम का

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

नज़र में बंद करे है तू एक आलम को

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कोई बतलाता नहीं आलम में उस के घर की राह

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इस ज़माने में न हो क्यूँकर हमारा दिल उदास

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तू सुब्ह-दम न नहा बे-हिजाब दरिया में

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तरीक़त में अगर ज़ाहिद मुझे गुमराह जाने है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

सच अगर पूछो तो ना-पैदा है यक-रू आश्ना

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रखता हूँ मैं हक़ पर नज़र कोई कुछ कहो कोई कुछ कहो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

मिला दिए ख़ाक में ख़ुदा ने पलक के लगते ही शाह लाखों

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

मैं अपने दस्त पर शब ख़्वाब में देखा कि अख़गर था

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

करूँ हूँ रात दिन फेरे कई फेरे मियाँ साहिब

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कहीं वो सूरत-ए-ख़ूबाँ हुआ है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जब से तुम्हारी आँखें आलम को भाइयाँ हैं

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इश्क़ ने चुटकी सी ली फिर आ के मेरी जाँ के बीच

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इस ज़माने में न हो क्यूँकर हमारा दिल उदास

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दर्द-ए-दिल मेरी आह से पूछो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ऐ दिल न कर तू फ़िक्र पड़ेगा बला के हाथ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आशिक़ों के सैर करने का जहाँ ही और है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देर हो जाएगी फिर किस को सुनाई दोगे

शहज़ाद क़मर

अपने रोज़ ओ शब का आलम कर्बला से कम नहीं

शहज़ाद क़मर

हमारे शहर में है वो गुरेज़ का आलम

शहज़ाद अहमद

चुप के आलम में वो तस्वीर सी सूरत उस की

शहज़ाद अहमद

आरज़ू की बे-हिसी का गर यही आलम रहा

शहज़ाद अहमद

जीने मरने के दरमियान एक साअत

शहज़ाद अहमद

न बस्तियों को अज़ीज़ रक्खें न हम बयाबाँ से लौ लगाएँ

शहज़ाद अहमद

कुछ न कुछ हो तो सही अंजुमन-आराई को

शहज़ाद अहमद

कहीं भी साया नहीं किस तरफ़ चले कोई

शहज़ाद अहमद

जल भी चुके परवाने हो भी चुकी रुस्वाई

शहज़ाद अहमद

डूब जाएँगे सितारे और बिखर जाएगी रात

शहज़ाद अहमद

चुप के आलम में वो तस्वीर सी सूरत उस की

शहज़ाद अहमद

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