आसमाँ Poetry (page 9)

मिरी नज़र कि तरह दिल परिंद ओझल है

शाहिद जमील

यूँ देखने को देखते रहते हैं ख़्वाब लोग

शाहिद अहमद शोएब

दम अजनबी सदाओं का भरते हो साहिबो

शाहिद अहमद शोएब

ख़ाक-ए-दिल कहकशाँ से मिलती है

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

शहर-ए-अना में

शहाब जाफ़री

मैं

शहाब जाफ़री

मैं ही मैं बिखरा हुआ हूँ राह-ता-मंज़िल तमाम

शहाब जाफ़री

हयात में भी अजल का समाँ दिखाई दे

शहाब जाफ़री

बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम

शहाब जाफ़री

दिखा दो गर माँग अपनी शब को तो हश्र बरपा हो कहकशाँ पर

शाह नसीर

जो ब-ईं ग़म भी शादमाँ गुज़री

शफ़क़त काज़मी

तीर ख़त्म हैं तो क्या हाथ में कमाँ रखना

शफ़ीक़ सलीमी

तेज़ आँधी ने फ़क़त इक साएबाँ रहने दिया

शफ़ीक़ सलीमी

हम ज़मीन-ज़ादों को आसमाँ बना जाना

शफ़ीक़ सलीमी

ये क्या कि मेरे यक़ीं में ज़रा गुमाँ भी है

शफ़क़ सुपुरी

कुछ सबील-ए-रिज़्क़ हो फिर कहीं मकाँ भी हो

शफ़क़ सुपुरी

दम-ए-ता'मीर तख़रीब-ए-जहाँ कुछ और कहती है

शायर फतहपुरी

अब ज़मीन-ओ-आसमाँ के सब किनारों से अलग

शादाब उल्फ़त

ख़ुदा ही उस चुप की दाद देगा कि तुर्बतें रौंदे डालते हैं

शाद लखनवी

तमाम उम्र नमक-ख़्वार थे ज़मीं के हम

शाद अज़ीमाबादी

अपनी मजबूरी को हम दीवार-ओ-दर कहने लगे

शबनम रूमानी

बहार की धूप में नज़ारे हैं उस किनारे

शब्बीर शाहिद

तारे जो आसमाँ से गिरे ख़ाक हो गए

शाद आरफ़ी

फ़रिश्ते भी पहुँच सकते नहीं वो है मकाँ अपना

सेहर इश्क़ाबादी

फ़िराक़-मौसम के आसमाँ में उजाड़ तारे जुड़े हुए हैं

सीमाब ज़फ़र

अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं

सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर

कुछ भी न अब कहेंगे क़फ़स में ज़बाँ से हम

सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी

कुछ भी न अब कहेंगे क़फ़स में ज़बाँ से हम

सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी

कोई भी लफ़्ज़-ए-इबरत-आश्ना मैं पढ़ नहीं सकता

सय्यद नसीर शाह

हर्फ़-ए-आग़ाज़-ए-सदा-ए-कुन-फ़काँ था और मैं

सय्यद नसीर शाह

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