आसमाँ Poetry (page 8)

वही झुकी हुई बेलें वही दरीचा था

शकेब जलाली

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत

शकेब जलाली

साहिल तमाम अश्क-ए-नदामत से अट गया

शकेब जलाली

जब तक ग़म-ए-जहाँ के हवाले हुए नहीं

शकेब जलाली

मौत मेरी सखी

शाइस्ता हबीब

अनल-हक़ की हक़ीक़त को जो हो मंसूर सो जाने

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आ कर तिरी गली में क़दम-बोसी के लिए

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इस दौर के असर का जो पूछो बयाँ नहीं

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

हमारी सैर को गुलशन से कू-ए-यार बेहतर था

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

अब की चमन में गुल का ने नाम ओ ने निशाँ है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आशिक़ों के सैर करने का जहाँ ही और है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ये चाँद ही तिरी झोली में आ पड़े शायद

शहज़ाद अहमद

घबरा के आसमाँ की तरफ़ देखती थी ख़ल्क़

शहज़ाद अहमद

ख़ुद ही मिल बैठे हो ये कैसी शनासाई हुई

शहज़ाद अहमद

कहिए तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएँ

शहरयार

वो कौन था

शहरयार

तम्बीह

शहरयार

नफ़ी से इसबात तक

शहरयार

जिस्म की कश्ती में आ

शहरयार

दिल चीज़ क्या है आप मिरी जान लीजिए

शहरयार

दयार-ए-दिल न रहा बज़्म-ए-दोस्ताँ न रही

शहरयार

याद की बस्ती का यूँ तो हर मकाँ ख़ाली हुआ

शहराम सर्मदी

समुंदर तिश्नगी वहशत रसाई चश्मा-ए-लब तक

शहराम सर्मदी

रगों में रात से ये ख़ून सा रवाँ है क्या

शहराम सर्मदी

इनायत है तिरी बस एक एहसान और इतना कर

शहराम सर्मदी

संग-ज़नों के वास्ते फिर नए रास्तों में है

शाहिदा तबस्सुम

सितारा-चश्म है और मेहरबाँ है

शाहिदा हसन

मिरे ख़ुदा किसी सूरत उसे मिला मुझ से

शाहिद ज़की

शरीफ़ लोग कहाँ जाएँ क्या करें आख़िर

शाहिद लतीफ़

इक अज़ाब होता है रोज़ जी का खोना भी

शाहिद लतीफ़

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