आदमी Poetry (page 22)

फूल का या संग का इज़हार कर

अबुल हसनात हक़्क़ी

सब इक न इक सराब के चक्कर में रह गए

अबु मोहम्मद सहर

ख़ुद अपनी आदमी को बड़ी क़ैद-ए-सख़्त है

आबरू शाह मुबारक

ब्यारे तिरे नयन कूँ आहू कहे जो कोई

आबरू शाह मुबारक

चेहरों के मैले जिस्मों के जंगल थे हर जगह

अबरार आज़मी

तन्हा उदास शब के सिवा कोई भी न था

अबरार आज़मी

ये कार-ए-ख़ैर है इस को न कार-ए-बद समझो

आबिद मलिक

इक अजनबी की तरह है ये ज़िंदगी मिरे साथ

आबिद मलिक

जो कहते हैं किधर दीवानगी है

आबिद अख़्तर

अपनी कमी से पूछ न उस की कमी से पूछ

आबिद अख़्तर

समुंदर पार आ बैठे मगर क्या

अब्दुल्लाह जावेद

रूह को क़ालिब के अंदर जानना मुश्किल हुआ

अब्दुल्लाह जावेद

हम क्या कहें कि आबला-पाई से क्या मिला

अब्दुल्लाह जावेद

सितारों के आगे जो आबादियाँ हैं

अब्दुल हमीद अदम

दुआ को हाथ मिरा जब कभी उठा होगा

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

मंज़र शमशान हो गया है

अब्दुल अहद साज़

अधूरी नज़्म

अब्बास ताबिश

वही दर्द है वही बेबसी तिरे गाँव में मिरे शहर में

अब्बास दाना

मैं आख़िर आदमी हूँ कोई लग़्ज़िश हो ही जाती है

आसी करनाली

रुमूज़-ए-मस्लहत को ज़ेहन पर तारी नहीं करता

आसी करनाली

न जाने बाहर भी कितने आसेब मुंतज़िर हों

आनिस मुईन

ये दौर मुझ से ख़िरद का वक़ार माँगे है

आल-ए-अहमद सूरूर

रास्ते सिखाते हैं किस से क्या अलग रखना

आदिल रज़ा मंसूरी

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