आंख Poetry (page 17)

बे-सबब हाथ कटारी को लगाना क्या था

शाह नसीर

बे-मेहर-ओ-वफ़ा है वो दिल-आराम हमारा

शाह नसीर

कोई दम थमता नहीं बारान-ए-अश्क

शाह आसिम

इस्लाम और कुफ़्र हमारा ही नाम है

शाह आसिम

तुम्हारी याद तो लिपटी है पूरे घर के मंज़र से

सगुफ़ता यासमीन

शक़ आफ़ियत-कनार किनारे को कर गई

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

सवाल करता नहीं और जवाब उस की तलब

शफ़ीक़ सलीमी

वो मय-परस्त हूँ बदली न जब नज़र आई

शाद लखनवी

लुंज वो पा-ए-तलब हूँ कहीं जा ही न सकूँ

शाद लखनवी

क्या ये बुत बैठेंगे ख़ुदा बन कर

शाद लखनवी

ख़त देखिए दीदार की सूझी ये नई है

शाद लखनवी

अक़्लीम-ए-दिल पे इश्क़ की फ़रमाँ-रवाइयाँ

शाद बिलगवी

भरे हों आँख में आँसू ख़मीदा गर्दन हो

शाद अज़ीमाबादी

लुत्फ़ क्या है बे-ख़ुदी का जब मज़ा जाता रहा

शाद अज़ीमाबादी

क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा

शाद अज़ीमाबादी

उन की शर्मिंदा-ए-एहसान सी हो जाती है

शबनम शकील

गए बरस की यही बात यादगार रही

शबनम शकील

दिल में ख़ूँ और आँख में पानी बहुत

शबनम शकील

ढलता सूरज आँख का रेज़ा हो जाता है

शबनम रूमानी

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

मैं

शबनम अशाई

अगर बिछड़ने का उस से कोई मलाल नहीं

शबाना यूसुफ़

ये अपने आप पे ताज़ीर कर रही हूँ मैं

शबाना यूसुफ़

उसी के क़ुर्ब में रह कर हरी भरी हुई है

शबाना यूसुफ़

नींद से आँख वो मिल कर जागे

शायर लखनवी

नफ़स नफ़स पे नया सोज़-ए-आगही रखना

शायर लखनवी

ख़्वाब से आँख वो मल कर जागे

शायर लखनवी

हर-चंद कि साग़र की तरह जोश में रहिए

शानुल हक़ हक़्क़ी

वक़्त क्या शय है पता आप ही चल जाएगा

शाद आरफ़ी

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