आंख Poetry (page 15)

ख़ुद ही मिल बैठे हो ये कैसी शनासाई हुई

शहज़ाद अहमद

ख़िज़ाँ जब आए तो आँखों में ख़ाक डालता हूँ

शहज़ाद अहमद

जो दिल में खटकती है कभी कह भी सकोगे

शहज़ाद अहमद

जिस ने तिरी आँखों में शरारत नहीं देखी

शहज़ाद अहमद

हिज्र की रात मिरी जाँ पे बनी हो जैसे

शहज़ाद अहमद

दिल बहुत मसरूफ़ था कल आज बे-कारों में है

शहज़ाद अहमद

चुप के आलम में वो तस्वीर सी सूरत उस की

शहज़ाद अहमद

भटकती हैं ज़माने में हवाएँ

शहज़ाद अहमद

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है

शहज़ाद अहमद

अब न वो शोर न वो शोर मचाने वाले

शहज़ाद अहमद

आती है दम-ब-दम ये सदा जागते रहो

शहज़ाद अहमद

आज तक उस की मोहब्बत का नशा तारी है

शहज़ाद अहमद

दिल परेशाँ हो मगर आँख में हैरानी न हो

शहरयार

वामांदगी-ए-शौक़

शहरयार

रतजगों का ज़वाल

शहरयार

रात जुदाई की रात

शहरयार

नफ़ी से इसबात तक

शहरयार

ला-ज़वाल सुकूत

शहरयार

ख़्वाब का दर बंद है

शहरयार

आख़िरी साँस

शहरयार

ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है

शहरयार

नशात-ए-ग़म भी मिला रंज-ए-शाद-मानी भी

शहरयार

खुले जो आँख कभी दीदनी ये मंज़र हैं

शहरयार

हमारी आँख में नक़्शा ये किस मकान का है

शहरयार

दिल परेशाँ हो मगर आँख में हैरानी न हो

शहरयार

शिकस्त

शहराम सर्मदी

मौसम-ए-हिज्र में

शहराम सर्मदी

याद की बस्ती का यूँ तो हर मकाँ ख़ाली हुआ

शहराम सर्मदी

मैं नहीं रोता हूँ अब ये आँख रोती है मुझे

शहराम सर्मदी

इनायत है तिरी बस एक एहसान और इतना कर

शहराम सर्मदी

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