आंख Poetry (page 24)

नया अदम कोई नई हदों का इंतिख़ाब अब

रियाज़ लतीफ़

कुछ भी हो 'रियाज़' आँख में आँसू नहीं आते

रियाज़ ख़ैराबादी

हम बंद किए आँख तसव्वुर में पड़े हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

ज़िद हमारी दुआ से होती है

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सीधे जो अब ज़ुल्फ़ों वाले हुए हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की

रियाज़ ख़ैराबादी

वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता

रियाज़ ख़ैराबादी

वो गुल हैं न उन की वो हँसी है

रियाज़ ख़ैराबादी

सितम-ए-ना-रवा को रोते हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

'रियाज़' इक चुलबुला सा दिल हो हम हों

रियाज़ ख़ैराबादी

पैमाने में वो ज़हर नहीं घोल रहे थे

रियाज़ ख़ैराबादी

नज़र आती है दूर की सूरत

रियाज़ ख़ैराबादी

नहीं छुपता तिरे इ'ताब का रंग

रियाज़ ख़ैराबादी

मुझ को न दिल पसंद न दिल की ये ख़ू पसंद

रियाज़ ख़ैराबादी

कोई पूछे न हम से क्या हुआ दिल

रियाज़ ख़ैराबादी

ख़्वाब में भी नज़र आ जाए जो घर की सूरत

रियाज़ ख़ैराबादी

जो थे हाथ मेहंदी लगाने के क़ाबिल

रियाज़ ख़ैराबादी

जो हम आए तो बोतल क्यूँ अलग पीर-ए-मुग़ाँ रख दी

रियाज़ ख़ैराबादी

जवानी मय-ए-अरग़वानी से अच्छी

रियाज़ ख़ैराबादी

जफ़ा में नाम निकालो न आसमाँ की तरह

रियाज़ ख़ैराबादी

गुल मुरक़्क़ा' हैं तिरे चाक गरेबानों के

रियाज़ ख़ैराबादी

दर खुला सुब्ह को पौ फटते ही मय-ख़ाने का

रियाज़ ख़ैराबादी

अक्स पर यूँ आँख डाली जाएगी

रियाज़ ख़ैराबादी

हूर पर आँख न डाले कभी शैदा तेरा

रिन्द लखनवी

मुँह न ढाँको अब तो सूरत देख ली

रिन्द लखनवी

हैरान सी है भचक रही है

रिन्द लखनवी

छुप के घर ग़ैर के जाया न करो

रिन्द लखनवी

अब कहीं साया-ए-गेसू भी नहीं

रिफ़अत सुलतान

वो दिल कि था कभी सरसब्ज़ खेतियों की तरह

रियाज़ मजीद

दुनिया को हर चीज़ दिखाई जा सकती है

रेनू नय्यर

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