आंख Poetry (page 5)
जब आँख खुली मेरी
वज़ीर आग़ा
इक बे-अंत वजूद
वज़ीर आग़ा
वो परिंदा है कहाँ शब को चहकने वाला
वज़ीर आग़ा
उड़ी जो गर्द तो इस ख़ाक-दाँ को पहचाना
वज़ीर आग़ा
सुनो उजड़ा मकाँ इक बद-दुआ है
वज़ीर आग़ा
सितारा तो कभी का जल-बुझा है
वज़ीर आग़ा
ख़ुद से हुआ जुदा तो मिला मर्तबा तुझे
वज़ीर आग़ा
धार सी ताज़ा लहू की शबनम-अफ़्शानी में है
वज़ीर आग़ा
बादल छटे तो रात का हर ज़ख़्म वा हुआ
वज़ीर आग़ा
नसीम-ए-सुब्ह यूँ ले कर तिरा पैग़ाम आती है
वासिफ़ देहलवी
तुम मिरी आँख के तेवर न भुला पाओगे
वसी शाह
कैसा मफ़्तूह सा मंज़र है कई सदियों से
वसी शाह
शरीर तेरी तरह आँख भी तिरी होगी
वसीम ख़ैराबादी
क़तरे गिरे जो कुछ अरक़-ए-इंफ़िआ'ल के
वसीम ख़ैराबादी
कम सितम करने में क़ातिल से नहीं दिल मेरा
वसीम ख़ैराबादी
वो पूछता था मिरी आँख भीगने का सबब
वसीम बरेलवी
तेरी याद
वसीम बरेलवी
तुम्हें ग़मों का समझना अगर न आएगा
वसीम बरेलवी
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
वसीम बरेलवी
सभी का धूप से बचने को सर नहीं होता
वसीम बरेलवी
नहीं कि अपना ज़माना भी तो नहीं आया
वसीम बरेलवी
मुझे तो क़तरा ही होना बहुत सताता है
वसीम बरेलवी
क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता
वसीम बरेलवी
दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता
वसीम बरेलवी
चाँद का ख़्वाब उजालों की नज़र लगता है
वसीम बरेलवी
अपने साए को इतना समझाने दे
वसीम बरेलवी
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
वसीम बरेलवी
कैसे उस को दिल की हालत समझाऊँ
वसीम अकरम
देख उसे सब ज़िक्र हमारा करते हैं
वसीम अकरम
जब से मैं ने इश्क़ का पैराहन पहना है
वसीम अकरम
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