बात Poetry (page 101)

एक ख़्वाब और

अली सरदार जाफ़री

ये एक फ़ितरी अमल है

अली साहिल

दस्तक

अली साहिल

चुनी हुई दीवार में दर

अली साहिल

इक तुर्फ़ा तमाशा सर-ए-बाज़ार बनेगा

अली मुतहर अशअर

उसी के लिए

अली मोहम्मद फ़र्शी

दिल में जो दर्द है वो निगाहों से है अयाँ

अली जव्वाद ज़ैदी

तय कर चुके ये ज़िंदगी-ए-जावेदाँ से हम

अली जव्वाद ज़ैदी

शिकवे हम अपनी ज़बाँ पर कभी लाए तो नहीं

अली जव्वाद ज़ैदी

जो मक़्सद गिर्या-ए-पैहम का है वो हम समझते हैं

अली जव्वाद ज़ैदी

है ख़मोश आँसुओं में भी नशात-ए-कामरानी

अली जव्वाद ज़ैदी

आँख कुछ बे-सबब ही नम तो नहीं

अली जव्वाद ज़ैदी

अब कोई ग़म ही नहीं है जो रुलाए मुझ को

अली इमरान

फ़रेब-ए-जल्वा कहाँ तक ब-रू-ए-कार रहे

अली अख़्तर अख़्तर

मुख़्तसर बात थी, फैली क्यूँ सबा की मानिंद

अली अकबर नातिक़

लुहार जानता नहीं

अली अकबर नातिक़

बाद-ए-सहरा को रह-ए-शहर पे डाला किस ने

अली अकबर नातिक़

कभी सर पे चढ़े कभी सर से गुज़रे कभी पाँव आन गिरे दरिया

अली अकबर अब्बास

जो ख़ुद को पाएँ तो फिर दूसरा तलाश करें

अली अकबर अब्बास

रोके से कहीं हादसा-ए-वक़्त रुका है

अली अहमद जलीली

काटी है ग़म की रात बड़े एहतिराम से

अली अहमद जलीली

ग़म से मंसूब करूँ दर्द का रिश्ता दे दूँ

अली अहमद जलीली

रूह की बात सुने जिस्म के तेवर देखे

अली अब्बास उम्मीद

मौत आई है ज़माने की तो मर जाने दो

अलीम उस्मानी

अब जाम निगाहों के नशा क्यूँ नहीं देते

अलीम उस्मानी

रूह अफ़्सुर्दा तबीअत मिरी ग़म-कोश हुई

अलीम मसरूर

ये और बात कि इक़रार कर सकें न कभी

अलीम अख़्तर

किसी के वादा-ए-फ़र्दा पर ए'तिबार तो है

अलीम अख़्तर

मिरी दस्तरस में है गर क़लम मुझे हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दे

आलमताब तिश्ना

किस किस से दोस्ती हुई ये ध्यान में नहीं

आलमताब तिश्ना

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