बात Poetry (page 102)

तिरे ख़याल को ज़ंजीर करता रहता हूँ

आलम ख़ुर्शीद

हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं

आलम ख़ुर्शीद

ख़ाक से ख़्वाब तलक एक सी वीरानी है

अकरम महमूद

अब दिल भी दुखाओ तो अज़िय्यत नहीं होती

अकरम महमूद

यादें

अख़्तर-उल-ईमान

राह-ए-फ़रार

अख़्तर-उल-ईमान

मुकाफ़ात

अख़्तर-उल-ईमान

बाज़-आमद --- एक मुन्ताज

अख़्तर-उल-ईमान

आख़िरी मुलाक़ात

अख़्तर-उल-ईमान

फिर वही शब के सराबों का चलन!

अख़्तर ज़ियाई

इरफ़ान-ओ-आगही के सज़ा-वार हम हुए

अख़्तर ज़ियाई

वो मुस्कुरा के कोई बात कर रहा था 'शुमार'

अख्तर शुमार

पड़े थे हम भी जहाँ रौशनी में बिखरे हुए

अख्तर शुमार

इक दिन की बात हो तो उसे भूल जाएँ हम

अख़्तर शीरानी

उस मह-जबीं से आज मुलाक़ात हो गई

अख़्तर शीरानी

काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें

अख़्तर शीरानी

लम्हा लम्हा यही सोचूँ यही देखा चाहूँ

अख़तर शाहजहाँपुरी

ये हम से पूछते हो रंज-ए-इम्तिहाँ क्या है

अख़्तर सईद ख़ान

कहें किस से हमारा खो गया क्या

अख़्तर सईद ख़ान

तुझे ख़बर नहीं इस बात की अभी शायद

अख़्तर रज़ा सलीमी

दिल ओ निगाह पे तारी रहे फ़ुसूँ उस का

अख़्तर रज़ा सलीमी

अंदेशे मुझे निगल रहे हैं

अख़्तर रज़ा सलीमी

घोर अँधेरा

अख़्तर राही

शनासाई

अख़्तर पयामी

लम्स-ए-आख़िरी

अख़्तर पयामी

कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके

अख़्तर नज़्मी

वफ़ा करो जफ़ा मिले भला करो बुरा मिले

अख़तर मुस्लिमी

इक़रार-ए-मोहब्बत तो बड़ी बात है लेकिन

अख़तर मुस्लिमी

तुम अपनी ज़बाँ ख़ाली कर के ऐ नुक्ता-वरो पछताओगे

अख़तर मुस्लिमी

दिल ही रह-ए-तलब में न खोना पड़ा मुझे

अख़तर मुस्लिमी

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