चंद्रमा Poetry (page 10)

रुका तो राज़ खुला कब से अपने घर में था

शुजाअत अली राही

ख़ुद फ़रिश्ते तो नहीं हैं जो मुझे ले जा रहे हैं

शुजा ख़ावर

मिरी तलाश में वो भी ज़रूर आएगा

शोएब निज़ाम

दरों को चुनता हूँ दीवार से निकलता हूँ

शोएब निज़ाम

अंदोह-ए-बेश-ओ-कम न ग़म-ए-ख़ैर-ओ-शर में है

शिव दयाल सहाब

शब-ए-फ़िराक़ जो दिल में ख़याल-ए-यार रहा

शेर सिंह नाज़ देहलवी

जल्वा बे-माया सा था चश्म-ओ-नज़र से पहले

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

है ऐन-ए-वस्ल में भी मिरी चश्म सू-ए-दर

ज़ौक़

ज़ख़्मी हूँ तिरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से

ज़ौक़

ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है

ज़ौक़

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें

ज़ौक़

नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा

ज़ौक़

निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी

ज़ौक़

नाला इस शोर से क्यूँ मेरा दुहाई देता

ज़ौक़

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

कोई कमर को तिरी कुछ जो हो कमर तो कहे

ज़ौक़

किसी बेकस को ऐ बेदाद गर मारा तो क्या मारा

ज़ौक़

ख़ूब रोका शिकायतों से मुझे

ज़ौक़

ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े

ज़ौक़

कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे

ज़ौक़

जो कुछ कि है दुनिया में वो इंसाँ के लिए है

ज़ौक़

हम हैं और शुग़्ल-ए-इश्क़-बाज़ी है

ज़ौक़

हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का

ज़ौक़

हैं दहन ग़ुंचों के वा क्या जाने क्या कहने को हैं

ज़ौक़

दिल बचे क्यूँकर बुतों की चश्म-ए-शोख़-ओ-शंग से

ज़ौक़

दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे

ज़ौक़

दरिया-ए-अश्क चश्म से जिस आन बह गया

ज़ौक़

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

ज़ौक़

आँखें मिरी तलवों से वो मिल जाए तो अच्छा

ज़ौक़

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