चंद्रमा Poetry (page 8)

रक़्स-ए-ताऊस-ए-तमन्ना नहीं होने वाला

सुल्तान अख़्तर

मुसीबत में भी ग़ैरत-आश्ना ख़ामोश रहती है

सुल्तान अख़्तर

निज़ाम-ए-शम्स-ओ-क़मर कितने दस्त-ए-ख़ाक में हैं

सुलैमान अरीब

वो मिज़ाज दिल के बदल गए कि वो कारोबार नहीं रहा

सुलैमान अहमद मानी

जज़्बों से फ़रोज़ाँ हैं दहकते हुए रुख़्सार

सुहैल काकोरवी

इसी आशिक़ी में पैहम हुई ख़ानुमाँ-ख़राबी

सुहा मुजद्ददी

दो आलम के आफ़ात से दूर कर दे

सुहा मुजद्ददी

वो एक लड़की जो ख़ंदा-लब थी न जाने क्यूँ चश्म-तर गई वो

सूफ़िया अनजुम ताज

बंद हो जाए मिरी आँख अगर

सूफ़ी तबस्सुम

ये आज आए हैं किस अजनबी से देस में हम

सूफ़ी तबस्सुम

वफ़ा की आख़िरी मंज़िल भी आ रही है क़रीब

सूफ़ी तबस्सुम

शजर शजर निगराँ है कली कली बेदार

सूफ़ी तबस्सुम

नज़र में ढल के उभरते हैं दिल के अफ़्साने

सूफ़ी तबस्सुम

नज़र में ढल के उभरते हैं दिल के अफ़्साने

सूफ़ी तबस्सुम

ख़ामोशी कलाम हो गई है

सूफ़ी तबस्सुम

काविश-ए-बेश-ओ-कम की बात न कर

सूफ़ी तबस्सुम

ग़म-नसीबों को किसी ने तो पुकारा होगा

सूफ़ी तबस्सुम

तिरी ज़ुल्फ़ के पेच-ओ-ख़म देखते हैं

सुदर्शन कुमार वुग्गल

तुम न घबराओ मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देख कर

सुदर्शन फ़ाकिर

यूँ सुबुक-दोश हूँ जीने का भी इल्ज़ाम नहीं

सिराज लखनवी

वो ज़कात-ए-दौलत-ए-सब्र भी मिरे चंद अश्कों के नाम से

सिराज लखनवी

न कुरेदूँ इश्क़ के राज़ को मुझे एहतियात-ए-कलाम है

सिराज लखनवी

जाँ-सिपारी दाग़ कत्था चूना है चश्म-ए-इन्तिज़ार

सिराज औरंगाबादी

डोरे नहीं हैं सुर्ख़ तिरी चश्म-ए-मस्त में

सिराज औरंगाबादी

दिल में आ राह-ए-चश्म-ए-हैराँ सीं

सिराज औरंगाबादी

यार को बे-हिजाब देखा हूँ

सिराज औरंगाबादी

यार जब पेश-ए-नज़र होता है

सिराज औरंगाबादी

वहशत को मिरी देख कि मजनूँ ने कहा बस

सिराज औरंगाबादी

उश्शाक़ का दिल दाग़ का अंदाज़ा हुआ महज़

सिराज औरंगाबादी

तिरी ज़ुल्फ़ ज़ुन्नार का तार है

सिराज औरंगाबादी

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