चंद्रमा Poetry (page 31)

ग़ुबार-ए-तंग-ज़ेहनी सूरत-ए-ख़ंजर निकलता है

फ़सीह अकमल

वही में हूँ वही ख़ाली मकाँ है

फ़ारूक़ नाज़की

वही मैं हूँ वही ख़ाली मकाँ है

फ़ारूक़ नाज़की

नई बासी कोई ख़बर दे दे

फ़ारूक़ नाज़की

ब-रोज़-ए-हश्र मिरे साथ दिल-लगी ही तो है

फ़ारूक़ बाँसपारी

मुझ पे हो जाए तिरी चश्म-ए-करम गर पल भर

फ़रहत शहज़ाद

शाम कहती है कोई बात जुदा सी लिक्खूँ

फ़रहत शहज़ाद

ज़मीं से अर्श तलक सिलसिला हमारा भी था

फ़रहत एहसास

रास्ता दे ऐ हुजूम-ए-शहर घर जाएँगे हम

फ़रहत एहसास

नहीं देखता दिन जिसे चश्म-ए-शब देखती है

फ़रहत एहसास

मिला है जिस्म कि उस का गुमाँ मिला है मुझे

फ़रहत एहसास

हर इक जानिब उन आँखों का इशारा जा रहा है

फ़रहत एहसास

बहुत सी आँखें लगीं हैं और एक ख़्वाब तय्यार हो रहा है

फ़रहत एहसास

औरों ने उस गली से क्या क्या न कुछ ख़रीदा

फ़रहत एहसास

वो क़ाफ़िला जो रह-ए-शाएरी में कम उतरा

फ़रहान सालिम

मक्र-ए-हयात रुख़ की क़बा भी उतार दी

फ़रहान सालिम

क्या बताएँ क्या कल शब आख़िरी पहर देखा

फ़रहान सालिम

कभी न सोचा था मैं ने उड़ान भरते हुए

फ़राग़ रोहवी

ले ए'तिबार-ए-वादा-ए-फ़र्दा नहीं रहा

फ़ानी बदायुनी

ऐ मौत तुझ पे उम्र-ए-अबद का मदार है

फ़ानी बदायुनी

तुम हो शरीक-ए-ग़म तो मुझे कोई ग़म नहीं

फ़ना बुलंदशहरी

किस तरह छोड़ दूँ ऐ यार मैं चाहत तेरी

फ़ना बुलंदशहरी

जल्वा जो तिरे रुख़ का एहसास में ढल जाए

फ़ना बुलंदशहरी

आँखों में नमी आई चेहरे पे मलाल आया

फ़ना बुलंदशहरी

फिर ज़बान-ए-इश्क़ चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ होने लगी

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ज़िंदगी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

'सज्जाद-ज़हीर' के नाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हुस्न और मौत

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फ़र्श-ए-नौमीदी-ए-दीदार

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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