चेहरा Poetry (page 22)

कोई सनम तो हो कोई अपना ख़ुदा तो हो

बशर नवाज़

चाँद सा चेहरा जो उस का आश्कारा हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

बहुत ज़ी-फ़हम हैं दुनिया को लेकिन कम समझते हैं!

बाक़र मेहदी

बअ'द मुद्दत ये जिला किस के हुनर ने बख़्शी

बकुल देव

तिरा लहज़ा वही तलवार जैसा था

बकुल देव

हादसात अब के सफ़र में नए ढब से आए

बकुल देव

यास की कोहर में लिपटा हुआ चेहरा देखा

बाग़ हुसैन कमाल

तब

बद्र मुनीरुद्दीन

आँखें मेरी क्या ढूँडती हैं

बदनाम नज़र

मुझ को नहीं मालूम कि वो कौन है क्या है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

महसूस हो रहा है जो ग़म मेरी ज़ात का

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

भागते सूरज को पीछे छोड़ कर जाएँगे हम

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

चाँद सा चेहरा कुछ इतना बेबाक हुआ

अज़्म शाकरी

मुराजअत

अज़ीज़ तमन्नाई

बाक़ीस्त शब-ए-फ़ित्ना

अज़ीज़ क़ैसी

मोजज़े का दर खुला और इक असा रौशन हुआ

अज़ीज़ नबील

दश्त-ओ-सहरा में समुंदर में सफ़र है मेरा

अज़ीज़ नबील

वरक़ उलट दिया करता है बे-ख़याली में

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

एक मुद्दत से ख़यालों में बसा है जो शख़्स

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

थकन से चूर हूँ लेकिन रवाँ-दवाँ हूँ मैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

पड़ा है ज़िंदगी के इस सफ़र से साबिक़ा अपना

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

दुनिया के जंजाल न पूछ

अज़ीज़ अन्सारी

मिरी दुनिया अकेली हो रही है

अज़हर नैयर

मैं अपने शहर में अपना ही चेहरा खो बैठा

अज़हर नैयर

घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए

अज़हर इक़बाल

अपनी तस्वीर बनाओगे तो होगा एहसास

अज़हर इनायती

तिरे तक़ाज़ों पे चेहरे बदल रहा हूँ मैं

अज़हर इनायती

मयस्सर हो जो लम्हा देखने को

अज़हर इनायती

सब बातें ला-हासिल ठहरीं सारे ज़िक्र फ़ुज़ूल गए

अज़हर अली

मेरे हरे वजूद से पहचान उस की थी

अज़हर अदीब

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