चेहरा Poetry (page 21)

कैसा वो मौसम था ये तो समझ न पाए हम

चंद्र प्रकाश शाद

ये मोहब्बत जो मोहब्बत से कमाई हुई है

चाँदनी पांडे

ले उड़ा रंग फ़लक जल्वा-ए-रा'नाई का

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

अब के बरस भी महका महका ख़्वाब दरीचा लगता है

बुशरा ज़ैदी

ये शहर-ए-ना-रसाई है

बुशरा एजाज़

सुलगती रेत में इक चेहरा आब सा चमका

बृजेश अम्बर

देखने निकला हूँ दुनिया को मगर क्या देखूँ

बिमल कृष्ण अश्क

चाँद को रेशमी बादल से उलझता देखूँ

बिमल कृष्ण अश्क

दीवार-ओ-दर में सिमटा इक लम्स काँपता है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

एक ख़्वाब

बिलाल अहमद

रिस रहा है मुद्दत से कोई पहला ग़म मुझ में

बिलाल अहमद

समुंदरों को भी दरिया समझ रहे हैं हम

भारत भूषण पन्त

पराया लग रहा था जो वही अपना निकल आया

भारत भूषण पन्त

कुछ न कुछ सिलसिला ही बन जाता

भारत भूषण पन्त

किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है

भारत भूषण पन्त

जुस्तुजू मेरी कहीं थी और मैं भटका कहीं

भारत भूषण पन्त

दयार-ए-ज़ात में जब ख़ामुशी महसूस होती है

भारत भूषण पन्त

चाहतों के ख़्वाब की ताबीर थी बिल्कुल अलग

भारत भूषण पन्त

अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है

भारत भूषण पन्त

मुझ को शिकस्तगी का क़लक़ देर तक रहा

बेकल उत्साही

जब से मिरे रक़ीब का रस्ता बदल गया

बशीर महताब

वो चेहरा किताबी रहा सामने

बशीर बद्र

शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ

बशीर बद्र

दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे

बशीर बद्र

शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ

बशीर बद्र

परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता

बशीर बद्र

मैं कब तन्हा हुआ था याद होगा

बशीर बद्र

दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे

बशीर बद्र

बड़े ताजिरों की सताई हुई

बशीर बद्र

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

बशर नवाज़

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