दम Poetry (page 14)

जब वो आली-दिमाग़ हँसता है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जब आप से ही गुज़र गए हम

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इस की क़ुदरत की दीद करता हूँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

गर भला मानस है तो ख़ंदों से तू मिल मिल न हँस

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

एक मुद्दत से तलबगार हूँ किन का इन का

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देख बुनियाद रब की आदम है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

औक़ात-ए-शैख़ गो कि सुजूद ओ क़याम है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आब-ए-हयात जा के किसू ने पिया तो क्या

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दिन वस्ल के रंज-ए-शब-ए-ग़म भूल गए हैं

शैख़ मीर बख़्श मसरूर

अपने रोज़ ओ शब का आलम कर्बला से कम नहीं

शहज़ाद क़मर

दुनिया अपनी मौत जल्द-अज़-जल्द मर जाने को है

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

दुनिया अपनी मौत जल्द-अज़-जल्द मर जाने को है

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

हर दम तिरी शबीह थी आँखों के सामने

शहज़ाद अहमद

प्यार के रंग-महल बरसों में तय्यार हुए

शहज़ाद अहमद

बाग़-ए-बहिश्त के मकीं कहते हैं मर्हबा मुझे

शहज़ाद अहमद

आती है दम-ब-दम ये सदा जागते रहो

शहज़ाद अहमद

ये इक शजर कि जिस पे न काँटा न फूल है

शहरयार

जुदा हुए वो लोग कि जिन को साथ में आना था

शहरयार

जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है

शहरयार

पतंग उड़ाने से पहले

शहराम सर्मदी

कार-ए-बेहूदा

शहराम सर्मदी

वो सामने हों मिरे और नज़र झुकी न रहे

शहनाज़ मुज़म्मिल

तेरी मर्ज़ी के ख़द-ओ-ख़ाल में ढलता हुआ मैं

शाहिद ज़की

ख़ौफ़ से अब यूँ न अपने घर का दरवाज़ा लगा

शाहिद मीर

वो क्यूँ आया

शाहिद मलिक

इक अज़ाब होता है रोज़ जी का खोना भी

शाहिद लतीफ़

सोच रहा है इतना क्यूँ ऐ दस्त-ए-बे-ताख़ीर निकाल

शाहिद कमाल

फिर आज दर्द से रौशन हुआ है सीना-ए-ख़्वाब

शाहिद कमाल

जो मिरी पुश्त में पैवस्त है उस तीर को देख

शाहिद कमाल

जो इस चमन में ये गुल सर्व-ओ-यासमन के हैं

शाहिद कमाल

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