दम Poetry (page 16)

कुछ सरगुज़िश्त कह न सके रू-ब-रू क़लम

शाह नसीर

ख़ुदा के वास्ते चेहरे से टुक नक़ाब उठा

शाह नसीर

ख़ानदान-ए-क़ैस का मैं तो सदा से पीर हूँ

शाह नसीर

जूँ ज़र्रा नहीं एक जगह ख़ाक-नशीं हम

शाह नसीर

जो गुज़रे है बर आशिक़-ए-कामिल नहीं मालूम

शाह नसीर

हो चुकी बाग़ में बहार अफ़सोस

शाह नसीर

फ़ुर्सत एक दम की है जूँ हबाब पानी याँ

शाह नसीर

दिल जल्वा-गाह-ए-सूरत-ए-जानाना हो गया

शाह नसीर

दिल इश्क़-ए-ख़ुश-क़दाँ में जो ख़्वाहान-ए-नाला था

शाह नसीर

दिखा दो गर माँग अपनी शब को तो हश्र बरपा हो कहकशाँ पर

शाह नसीर

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

दम ले ऐ कोहकन अब तेशा-ज़नी ख़ूब नहीं

शाह नसीर

छोड़ा न तुझे ने राम क्या ये भी न हुआ वो भी न हुआ

शाह नसीर

बे-सबब हाथ कटारी को लगाना क्या था

शाह नसीर

बे-मेहर-ओ-वफ़ा है वो दिल-आराम हमारा

शाह नसीर

बा'द-ए-मजनूँ क्यूँ न हूँ मैं कार-फ़रमा-ए-जुनूँ

शाह नसीर

बादा-कशी के सिखलाते हैं क्या ही क़रीने सावन-भादों

शाह नसीर

मुझे साक़ी-ए-चश्म-ए-यार ने अजब एक जाम पिला दिया

शाह आसिम

लश्कर-ए-इश्क़ आ पड़ा है मुल्क-ए-दिल पर टूट टूट

शाह आसिम

कोई दम थमता नहीं बारान-ए-अश्क

शाह आसिम

अफ़्साना मिरे दिल का दिल-आज़ार से कह दो

शाह आसिम

मुल्ज़िम ठहरी मैं अपनी सच्चाई से

सगुफ़ता यासमीन

मेहमाँ है कोई दम का ज़माना शबाब का

शाग़िल क़ादरी

मौसम-ए-गुल आ गया फिर दश्त-पैमाई रहे

शाग़िल क़ादरी

सारी ताबीरें हैं उस की सारे ख़्वाब उस के लिए

शफ़ीक़ सलीमी

गाँव रफ़्ता रफ़्ता बनते जाते हैं अब शहर

शफ़ीक़ सलीमी

करते हैं अगर मुझ से वो प्यार तो आ जाएँ

शफ़ीक़ ख़लिश

इक कार-ए-गराँ है खेल नहीं

शफ़ीक़ देहलवी

टूटे जो दाँत मुँह की शबाहत बिगड़ गई

शाद लखनवी

तस्वीर मिरी है अक्स तिरा तू और नहीं मैं और नहीं

शाद लखनवी

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