दम Poetry (page 17)
शर्तें जो बंदगी में लगाना रवा हुआ
शाद लखनवी
नज़रों से गुलों की नौ-निहालो
शाद लखनवी
ना-तवाँ वो हूँ निगाहों में समा ही न सकूँ
शाद लखनवी
मिस्ल-ए-ख़ंजर लेसान रखते हैं
शाद लखनवी
मिरी बे-रिश्ता-दिली से उसे मज़ा मिल जाए
शाद लखनवी
लब-ब-लब बिंत-उल-अनब हर-दम रहे
शाद लखनवी
ख़ुदा ही उस चुप की दाद देगा कि तुर्बतें रौंदे डालते हैं
शाद लखनवी
ख़त देखिए दीदार की सूझी ये नई है
शाद लखनवी
जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे
शाद लखनवी
इश्क़-ए-रुख़-ओ-ज़ुल्फ़ में किया कूच
शाद लखनवी
हस्ती-ओ-अदम में नफ़स-ए-चंद बशर के
शाद लखनवी
ग़ैरों में हिना वो मल रहा है
शाद लखनवी
दुनिया में क़स्र-ओ-ऐवाँ बे-फ़ाएदा बनाया
शाद लखनवी
देख कर रू-ए-सनम को न बहल जाऊँगा
शाद लखनवी
बोलना बादा-कशों से न ज़रा ऐ वाइज़
शाद लखनवी
बद-गुमानी जो हुई शम्अ' से परवाने को
शाद लखनवी
ये रात भयानक हिज्र की है काटेंगे बड़े आलाम से हम
शाद अज़ीमाबादी
तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
शाद अज़ीमाबादी
लुत्फ़ क्या है बे-ख़ुदी का जब मज़ा जाता रहा
शाद अज़ीमाबादी
जिए जाएँगे हम भी लब पे दम जब तक नहीं आता
शाद अज़ीमाबादी
अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया
शाद अज़ीमाबादी
सफ़र की आख़िरी मंज़िल के राहबर हम हैं
शबनम शकील
हाथ न आई दुनिया भी और इश्क़ में भी गुमनाम रहे
शबनम शकील
मेरे प्यार का क़िस्सा तो हर बस्ती में मशहूर है चाँद
शबनम रूमानी
आ गया है वक़्त अब भुगतोगे ख़ामियाज़े बहुत
शबाब ललित
कहाँ फ़ुर्क़त में है दिलदार उठना बैठना चलना
शबाब
जेहल को इल्म का मेआ'र समझ लेते हैं
शायर लखनवी
निकले तिरी दुनिया के सितम और तरह के
शानुल हक़ हक़्क़ी
नग़्मा यूँ साज़ में तड़पा मिरी जाँ हो जैसे
शानुल हक़ हक़्क़ी
इधर मौसम की ये ख़ुश-एहतिमामी
शानुल हक़ हक़्क़ी
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