दूर Poetry (page 30)

ग़म का सहरा न मिला दर्द का दरिया न मिला

साहिर होशियारपुरी

फ़ज़ा-ए-आलम-ए-क़ुदसी में है नश्व-ओ-नुमा मेरी

साहिर देहल्वी

ख़ुद को ख़ुद में तहलील करो

साहिल अहमद

जवाज़-ए-आब-ओ-ताब अब गुलाब के लिए नहीं

सहबा वहीद

पागल औरत

सहबा अख़्तर

हर रात का ख़्वाब

सहबा अख़्तर

यूँ भी हुआ इक अर्से तक इक शे'र न मुझ से तमाम हुआ

सहबा अख़्तर

क़ाबील का साया

सहर अंसारी

विसाल-ओ-हिज्र से वाबस्ता तोहमतें भी गईं

सहर अंसारी

मोहब्बत में वफ़ाओं का यही इनआ'म है 'सूफ़ी'

सग़ीर अहमद सूफ़ी

हर अंजुमन में दावा-ए-वहशत किया करो

सग़ीर अहमद सूफ़ी

है एक उम्र से ख़्वाहिश कि दूर जा के कहीं

सग़ीर मलाल

रात अंदर उतर के देखा है

सग़ीर मलाल

निकल गए थे जो सहरा में अपने इतनी दूर

सग़ीर मलाल

मैं ढूँड लूँ अगर उस का कोई निशाँ देखूँ

सग़ीर मलाल

जिसे सुनाओगे पहले ही सुन चुका होगा

सग़ीर मलाल

जब सामने की बात ही उलझी हुई मिले

सग़ीर मलाल

जिस दौर में लुट जाए ग़रीबों कमाई

साग़र सिद्दीक़ी

जब जाम दिया था साक़ी ने जब दौर चला था महफ़िल में

साग़र सिद्दीक़ी

रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए

साग़र सिद्दीक़ी

आँख तुम्हारी मस्त भी है और मस्ती का पैमाना भी

साग़र निज़ामी

उल्टी गंगा

साग़र ख़य्यामी

रोटी कपड़ा और मकान

साग़र ख़य्यामी

पस-ए-रौशनी

साग़र ख़य्यामी

उर्दू-ए-मुअ'ल्ला

सफ़ी लखनवी

तालिब-ए-दीद पे आँच आए ये मंज़ूर नहीं

सफ़ी लखनवी

तराना-ए-क़ौमी

सफ़ीर काकोरवी

बहार आई है फिर पैरहन गुलाबी हो

सफ़दर मीर

बग़ौर देखो तो ज़ख़्मों का इक चमन सा है

सफ़दर मीर

ये सब तो

सईदुद्दीन

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