दूर Poetry (page 31)

रेत

सईदुद्दीन

नज़्म

सईदुद्दीन

इजाज़त

सईदुद्दीन

किश्त-ए-दयार-ए-सुब्ह से तारे उगाऊँ मैं

सईद शरीक़

सोने के दिल मिट्टी के घर पीछे छोड़ आए हैं

सईद क़ैस

मैं दूर दूर से ख़ुद को उठा के लाता रहा

सईद नक़वी

अपनी तलाश में निकले

सईद नक़वी

मैं दोस्त से न किसी दुश्मनी से डरता हूँ

सईद नक़वी

चाहे हमारा ज़िक्र किसी भी ज़बाँ में हो

सईद नक़वी

शहर के फ़ुट-पाथ पर कुछ चुभते मंज़र देखना

सईद अख़्तर

कुछ हक़ीक़त तो हुआ करती थी इंसानों में

सईद अहमद अख़्तर

ज़वाल के आईने में ज़िंदा अक्स

सईद अहमद

रास्त अगर सर्व सी क़ामत करे

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

ऐ ख़ूब-रू फ़रिश्ता सियर-अंजुमन में आ

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

यूँ तो हर एक शख़्स ही तालिब समर का है

सादिक़ नसीम

वो जिस का रंग सलोना है बादलों की तरह

सादिक़ नसीम

किस मुँह से ज़िंदगी को वो रख़्शंदा कह सकें

सादिक़ नसीम

जब भी तिरी क़ुर्बत के कुछ इम्काँ नज़र आए

सादिक़ नसीम

हर शख़्स को ऐसे देखता हूँ

सादिक़ नसीम

दरवाज़े को पीट रहा हूँ पैहम चीख़ रहा हूँ

सादिक़

बिस्तर बिछा के रात वो कमरे में सो गया

सादिक़

लफ़्ज़ों को सजा कर जो कहानी लिखना

सदफ़ जाफ़री

नज़र से दूर हैं दिल से जुदा न हम हैं न तुम

साबिर ज़फ़र

वाक़िफ़ ख़ुद अपनी चश्म-ए-गुरेज़ाँ से कौन है

साबिर ज़फ़र

निगाह करने में लगता है क्या ज़माना कोई

साबिर ज़फ़र

नज़र से दूर हैं दिल से जुदा न हम हैं न तुम

साबिर ज़फ़र

नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं

साबिर ज़फ़र

में सोचता हूँ जिसे आश्ना भी होता है

साबिर ज़फ़र

मैं जिस के साथ 'ज़फ़र' उम्र भर उठा बैठा

साबिर ज़फ़र

अब कहीं और कहाँ ख़ाक-बसर हों तिरे बंदे जा कर

साबिर ज़फ़र

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