दूर Poetry (page 33)

किनारा-दर-किनारा मुस्तक़िल मंजधार है यूँ भी

रियाज़ लतीफ़

भर भर के जाम बज़्म में छलकाए जाते हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

थका ले और दौर-ए-आसमाँ तक

रियाज़ ख़ैराबादी

रूठे हुए कि अपने ज़रा अब मनाए ज़ुल्फ़

रियाज़ ख़ैराबादी

पैमाने में वो ज़हर नहीं घोल रहे थे

रियाज़ ख़ैराबादी

नज़र आती है दूर की सूरत

रियाज़ ख़ैराबादी

मुझ को न दिल पसंद न दिल की ये ख़ू पसंद

रियाज़ ख़ैराबादी

मय रहे मीना रहे गर्दिश में पैमाना रहे

रियाज़ ख़ैराबादी

जिस दिन से हराम हो गई है

रियाज़ ख़ैराबादी

हंस के पैमाना दिया ज़ालिम ने तरसाने के बा'द

रियाज़ ख़ैराबादी

गुलों के पर्दे में शक्लें हैं मह-जबीनों की

रियाज़ ख़ैराबादी

गुल मुरक़्क़ा' हैं तिरे चाक गरेबानों के

रियाज़ ख़ैराबादी

आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया

रियाज़ ख़ैराबादी

मेरे अफ़्कार ने जिस शय से जिला पाई है

रियासत अली ताज

मुज़्दा-बाद ऐ बादा-ख़्वारो दौर-ए-वाइज़ हो चुका

रिन्द लखनवी

सातों फ़लक किए तह-ओ-बाला निकल गया

रिन्द लखनवी

साइलाना उन के दर पर जब मिरा जाना हुआ

रिन्द लखनवी

मुझ बला-नोश को तलछट भी है काफ़ी साक़ी

रिन्द लखनवी

रहा असीर कई साल नक़्श-ए-पा की तरह

रिफ़अत सुलतान

तजस्सुस

रिफ़अत सरोश

नज्म-ए-सहर

रिफ़अत सरोश

इसी हुजूम में लड़-भिड़ के ज़िंदगी कर लो

रियाज़ मजीद

सत्‌ह-बीं थे सब, रहे बाहर की काई देखते

रियाज़ मजीद

बदल सका न जुदाई के ग़म उठा कर भी

रियाज़ मजीद

धूप को कुछ और जलना चाहिए

रेनू नय्यर

धूप को कुछ और जलना चाहिए

रेनू नय्यर

जागती आँखों का ख़्वाब

रहमान फ़ारिस

क्या से क्या हो गई इस दौर में हालत घर की

रहबर जौनपूरी

मैं ने तुम्हें चलना सिखाया था

रेहाना रूही

जिस को तुम कहते हो ख़ुश-बख़्त सदा है मज़लूम

रज़िया फ़सीह अहमद

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