दूर Poetry (page 34)

इक सहीफ़ा नया उतरा है सुना है लोगो

रज़िया फ़सीह अहमद

तुम किसी तौर किसी शक्ल नहीं कर सकते

राज़िक़ अंसारी

दहका पड़ा है जामा-ए-गुल यार ख़ैर हो

रज़ी रज़ीउद्दीन

हक़ीक़तों का पता दे के ख़ुद सराब हुआ

रज़ी मुजतबा

ये दौर-ए-कम-नज़राँ है तो फिर सिला कैसा

राज़ी अख्तर शौक़

वो शाख़-ए-गुल की तरह मौसम-ए-तरब की तरह

राज़ी अख्तर शौक़

वो शाख़-ए-गुल कि जो आवाज़-ए-अंदलीब भी थी

राज़ी अख्तर शौक़

था मिरी जस्त पे दरिया बड़ी हैरानी में

राज़ी अख्तर शौक़

फिर जो देखा दूर तक इक ख़ामुशी पाई गई

राज़ी अख्तर शौक़

ख़ुश्बू हैं तो हर दौर को महकाएँगे हम लोग

राज़ी अख्तर शौक़

हम जहाँ नग़्मा-ओ-आहंग लिए फिरते हैं

राज़ी अख्तर शौक़

ऐ सुब्ह-ए-उमीद देर क्या है

राज़ी अख्तर शौक़

रैलियाँ ही रैलियाँ

रज़ा नक़वी वाही

तुझे ऐ ज़ाहिद-बदनाम समझाना भी आता है

रज़ा जौनपुरी

शम्अ' की आग़ोश ख़ाली कर के परवाना चला

रज़ा जौनपुरी

ये दौर-ए-मसर्रत ये तेवर तुम्हारे

रज़ा हमदानी

हर अक्स ख़ुद एक आइना है

रज़ा हमदानी

यारब तू उस के दिल से सदा रखियो ग़म को दूर

रज़ा अज़ीमाबादी

इलाही चश्म-ए-बद उस से तू दूर ही रखियो

रज़ा अज़ीमाबादी

उस चश्म ने कि तूतियों को नुक्ता-दाँ किया

रज़ा अज़ीमाबादी

दामन से अपने झाड़ के सहरा-ए-ग़म की धूल

रज़ा अश्क

हूँ शामिल सब में और सब से जुदा हूँ

रज़ा अमरोही

ज़हर-ए-चश्म-ए-साक़ी में कुछ अजीब मस्ती है

रविश सिद्दीक़ी

उस से बढ़ कर तो कोई बे-सर-ओ-सामाँ न मिला

रविश सिद्दीक़ी

रंग पर जब वो बज़्म-ए-नाज़ आई

रविश सिद्दीक़ी

क्या सितम कर गई ऐ दोस्त तिरी चश्म-ए-करम

रविश सिद्दीक़ी

ख़्वाब-ए-दीदार न देखा हम ने

रविश सिद्दीक़ी

कहने को सब फ़साना-ए-ग़ैब-ओ-शुहूद था

रविश सिद्दीक़ी

कहीं फ़साना-ए-ग़म है कहीं ख़ुशी की पुकार

रविश सिद्दीक़ी

चला है ले के मुझे ज़ौक़-ए-जुस्तुजू मेरा

रविश सिद्दीक़ी

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