दूर Poetry (page 32)

वो धूप वो गलियाँ वही उलझन नज़र आए

साबिर वसीम

पहला पत्थर याद हमेशा रहता है

साबिर वसीम

करता है कोई और भी गिर्या मिरे दिल में

साबिर वसीम

देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है

साबिर वसीम

मुझे क़रार भँवर में उसे किनारे में

साबिर

जान गए तो मान लिया

सबीहा सबा, पाकिस्तान

ग़मों से अपने कोई शख़्स चूर होता है

सबीहा सबा, पाकिस्तान

दुरुस्त है कि ये दिन राएगाँ नहीं गुज़रे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

इदराक ही मुहाल है ख़्वाब-ओ-ख़याल का

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

इन पत्थरों के शहर में दिल का गुज़र कहाँ

सबा इकराम

यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा

सबा अकबराबादी

उस को भी हम से मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं

सबा अकबराबादी

कसरत-ए-जल्वा को आईना-ए-वहदत समझो

सबा अकबराबादी

सामने उन को पाया तो हम खो गए आज फिर हसरत-ए-गुफ़्तुगू रह गई

सबा अफ़ग़ानी

होश-ओ-ख़िरद से दूर हूँ सूद-ओ-ज़ियाँ से दूर

सबा अफ़ग़ानी

आँखों से वो कभी मिरी ओझल नहीं रहा

सअादत सईद

मोम पिघलाता रहा तेरा ख़याल

रुख़साना नूर

तो मिल भी जाए तो फिर भी तुझे तलाश करूँ

रूही कंजाही

पुर-हौल ख़राबों से शनासाई मिरी है

रूही कंजाही

मेरे लिए वो शख़्स मुसीबत भी बहुत है

रूही कंजाही

हज़ार रंग जलाल-ओ-जमाल के देखे

रूही कंजाही

और अभी तेज़ दौड़ना है मुझे

रूही कंजाही

आब-ए-रवाँ हूँ रास्ता क्यूँ न ढूँढ लूँ

रूही कंजाही

रू-ए-ज़मीं नहीं कि सर-ए-आसमाँ नहीं

रोहित सोनी ‘ताबिश’

गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बे-ख़बर न था

रोहित सोनी ‘ताबिश’

वीरान ख़्वाहिश

रियाज़ लतीफ़

आमद

रियाज़ लतीफ़

तमाम ख़लियों में अक्सर सुनाई देता है

रियाज़ लतीफ़

ताख़ीर आ पड़ी जो बदन के ज़ुहूर में

रियाज़ लतीफ़

नया अदम कोई नई हदों का इंतिख़ाब अब

रियाज़ लतीफ़

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