नदी Poetry (page 15)

तेरे सिवा भी कोई मुझे याद आने वाला था

शहरयार

शिकवा कोई दरिया की रवानी से नहीं है

शहरयार

शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को

शहरयार

पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात

शहरयार

कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें

शहरयार

हमारी आँख में नक़्शा ये किस मकान का है

शहरयार

देख दरिया को कि तुग़्यानी में है

शहरयार

अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो

शहरयार

ऐसे हिज्र के मौसम कब कब आते हैं

शहरयार

लौह-ए-अय्याम

शहराम सर्मदी

नसीब-ए-चश्म में लिक्खा है गर पानी नहीं होना

शहराम सर्मदी

तारीख़ के मुर्दा-ख़ाने से

शहनाज़ नबी

नए युग का ख़्वाब

शहनाज़ नबी

ज़िंदगी में यूँ तो हर इक हादिसा नागाह था

शहनाज़ नबी

हुआ सरकश अंधेरा सख़्त-जाँ है

शहनाज़ नबी

मोहब्बत से तिरी यादें जगा कर सो रहा हूँ

शहनवाज़ ज़ैदी

आओ फिर मिल जाएँ सब बातें पुरानी छोड़ कर

शहनवाज़ ज़ैदी

मैं ज़हर रही हर शाम रही

शाहिदा तबस्सुम

सराब-ए-शब भी है ख़्वाब-ए-शिकस्ता-पा भी है

शाहिदा हसन

यूँ मुझे तेरी सदा अपनी तरफ़ खींचती है

शाहिद ज़की

वार हुआ कुछ इतना गहरा पानी का

शाहिद मीर

तारीकियों का हम थे हदफ़ देखते रहे

शाहिद मीर

समुंदरों में अगर ख़लफ़िशार-ए-आब न हो

शाहिद मीर

लोग हैरान हैं हम क्यूँ ये किया करते हैं

शाहिद लतीफ़

सोच रहा है इतना क्यूँ ऐ दस्त-ए-बे-ताख़ीर निकाल

शाहिद कमाल

अक्स आईना-ख़ाना से अलग रक्खा है

शाहिद कमाल

जलती बुझती हुई शम्ओं का धुआँ रहता है

शाहिद कलीम

रेत की लहरों से दरिया की रवानी माँगे

शाहिद कबीर

लगता है जिस का रुख़-ए-ज़ेबा मह-ए-कामिल मुझे

शाहिद ग़ाज़ी

मोहब्बत मुझ से कहती थी ज़रा होश्यार दामन से

शाहिद भोपाली

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