नदी Poetry (page 14)
हम हैं और उन की ख़ुशी है आज-कल
शकील बदायुनी
इक इक क़दम फ़रेब-ए-तमन्ना से बच के चल
शकील बदायुनी
चाँदनी में रुख़-ए-ज़ेबा नहीं देखा जाता
शकील बदायुनी
संग थे पिघले तो पानी हो गए
शकील आज़मी
चढ़ा हुआ है जो दरिया उतरने वाला है
शकील आज़मी
अपनी हस्ती को मिटा दूँ तिरे जैसा हो जाऊँ
शकील आज़मी
ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं
शकेब जलाली
आइना देखा तो सूरत अपनी पहचानी गई
शाइस्ता मुफ़्ती
जिस तरफ़ को मैं गया रोता हुआ
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
दिल की लहरों का तूल-ओ-अर्ज़ न पूछ
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
अगर रोते न हम तो देखते तुम
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
यार निकला है आफ़्ताब की तरह
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
तू सुब्ह-दम न नहा बे-हिजाब दरिया में
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
तू जो कहता है बोलता क्या है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
वस्ल की शब में भी हम बाहम दिगर रोया किए
शैख़ करिमुद्दीन मुरादाबादी
सहर ने साँस ली सूरज चमकने वाला था
शहज़ाद हुसैन साइल
इस आस पे सैलाब के सीने पे रवाँ हूँ
शहज़ाद अहमद
हौसला है तो सफ़ीनों के अलम लहराओ
शहज़ाद अहमद
यूँ ख़ाक की मानिंद न राहों पे बिखर जा
शहज़ाद अहमद
तेरे घर की भी वही दीवार थी दरवाज़ा था
शहज़ाद अहमद
रात की नींदें तो पहले ही उड़ा कर ले गया
शहज़ाद अहमद
मैं कि ख़ुश होता था दरिया की रवानी देख कर
शहज़ाद अहमद
ख़ुद ही मिल बैठे हो ये कैसी शनासाई हुई
शहज़ाद अहमद
कौन कहता है कि दरिया में रवानी कम है
शहज़ाद अहमद
अगरचे कार-ए-दुनिया कुछ नहीं है
शहज़ाद अहमद
शिकवा कोई दरिया की रवानी से नहीं है
शहरयार
शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को
शहरयार
कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें
शहरयार
फ़रेब-दर-फ़रेब
शहरयार
ये जगह अहल-ए-जुनूँ अब नहीं रहने वाली
शहरयार
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