नदी Poetry (page 13)

बिखरे तो फिर बहम मिरे अज्ज़ा नहीं हुए

शाैकत वास्ती

मौज-ए-तूफ़ाँ से निकल कर भी सलामत न रहे

शौकत परदेसी

बीनाई भी क्या क्या धोके देती है

शारिक़ कैफ़ी

मुमकिन ही न थी ख़ुद से शनासाई यहाँ तक

शारिक़ कैफ़ी

कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए

शारिक़ कैफ़ी

कहीं न था वो दरिया जिस का साहिल था मैं

शारिक़ कैफ़ी

जो कहता है कि दरिया देख आया

शारिक़ कैफ़ी

भीड़ में जब तक रहते हैं जोशीले हैं

शारिक़ कैफ़ी

आइने का साथ प्यारा था कभी

शारिक़ कैफ़ी

अधूरा जिस्म लिए पीछे हट रहा हूँ मैं

शारिक़ जमाल

हमारे सर हर इक इल्ज़ाम धर भी सकता है

शारिब मौरान्वी

गर दर-ए-हर्फ़-ए-सदाक़त ये नहीं था फिर क्यूँ

शारिब मौरान्वी

मौज-ए-दरिया को पिएँ क्या ग़म-ए-ख़म्याज़ा करें

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मसल कर फेंक दूँ आँखें तो कुछ तनवीर हो पैदा

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

देखिए बे-बदनी कौन कहेगा क़ातिल है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

सदियों के तआ'क़ुब में लम्हे नहीं जाएँगे

शमशीर हैदर

ये अर्ज़-ओ-समा क़ुलज़ुम-ओ-सहरा मुतहर्रिक

शम्स रम्ज़ी

बा-वफ़ाई की अदा पाने लगा हूँ तुझ में

शमीम जयपुरी

शाम के साहिल पे सूरज का सफ़ीना आ लगा

शमीम हनफ़ी

नीले पीले सियाह सुर्ख़ सफ़ेद सब थे शामिल इसी तमाशे में

शमीम हनफ़ी

क्यूँ परेशान हुआ जाता है दिल क्या जाने

शमीम हनफ़ी

कई रातों से बस इक शोर सा कुछ सर में रहता है

शमीम हनफ़ी

कभी सहरा में रहते हैं कभी पानी में रहते हैं

शमीम हनफ़ी

एक बेनाम-ओ-निशाँ रूह का पैकर हूँ मैं

शमीम हनफ़ी

डूबते सूरज का मंज़र वो सुहानी कश्तियाँ

शमीम फ़ारूक़ी

इक्का दुक्का शाज़-ओ-नादिर बाक़ी हैं

शमीम अब्बास

ये तिरी ख़ल्क़-नवाज़ी का तक़ाज़ा भी नहीं

शकील जमाली

तिरे बग़ैर अजब बज़्म-ए-दिल का आलम है

शकील बदायुनी

पहलू में दर्द-ए-इश्क़ की दुनिया लिए हुए

शकील बदायुनी

मेरी दीवानगी नहीं जाती

शकील बदायुनी

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