नदी Poetry (page 12)

जाने क्या बात है मानूस बहुत लगता है

शोहरत बुख़ारी

जाने किस किस की तवज्जोह का तमाशा देखा

शोहरत बुख़ारी

किधर डुबो के कहाँ पर उभारता है तू

शोएब निज़ाम

सफ़र सराबों का बस आज कटने वाला है

शोएब निज़ाम

चश्म-ए-गर्दूं फिर तमाज़त अपनी बरसाने लगी

शोएब निज़ाम

अजब तिलिस्म है नैरंग-ए-जावेदानी का

शोएब निज़ाम

अब्र का टुकड़ा कोई बाला-ए-बाम आता हुआ

शोएब निज़ाम

पथराई आँखों में देखो क्या क्या रंग दिखाता आँसू

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

सर-ए-तुर्बत कहीं इक हुस्न की तस्वीर देखी है

शिव चरन दास गोयल ज़ब्त

टहनियाँ फूलों को तरसेंगी यहाँ तेरे बा'द

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

फूल शेरों की रवानी में चले तलवार भी

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

नुत्क़ पलकों पे शरर हो तो ग़ज़ल होती है

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

आसमानों से उतर कर मिरी धरती पे बिराज

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

हम रोने पे आ जाएँ तो दरिया ही बहा दें

ज़ौक़

ज़ख़्मी हूँ तिरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से

ज़ौक़

क़ुफ़्ल-ए-सद-ख़ाना-ए-दिल आया जो तू टूट गए

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

कोई इन तंग-दहानों से मोहब्बत न करे

ज़ौक़

कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे

ज़ौक़

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

ज़ौक़

मसअला हूँ मैं सदा से कम-निगाही के लिए

शहज़ाद रज़ा लम्स

होगी इस ढेर इमारत की कहानी कुछ तो

शहपर रसूल

शोख़ी ने तेरी लुत्फ़ न रक्खा हिजाब में

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

किसी के साथ अब साया नहीं है

शीन काफ़ निज़ाम

कभी जंगल कभी सहरा कभी दरिया लिख्खा

शीन काफ़ निज़ाम

मेरी वहशत का तिरे शहर में चर्चा होगा

शाज़ तमकनत

क्या करूँ रंज गवारा न ख़ुशी रास मुझे

शाज़ तमकनत

जाने क्या क़ीमत-ए-अरबाब-ए-वफ़ा ठहरेगी

शाज़ तमकनत

बिखरी थी हर सम्त जवानी रात घनेरी होने तक

शायान क़ुरैशी

फ़रियाद और तुझ को सितमगर कहे बग़ैर

शौक़ क़िदवाई

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