नदी Poetry (page 17)
वो नहा कर ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ को जो बिखराने लगे
शाद लखनवी
चश्म-ए-तर ने बहा के जू-ए-सरिश्क
शाद लखनवी
इश्क़ में ज़ोर उम्र-भर मारा
शाद लखनवी
न जाँ-बाज़ों का मजमा था न मुश्ताक़ों का मेला था
शाद अज़ीमाबादी
क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा
शाद अज़ीमाबादी
वहाँ भी ज़हर-ज़बाँ काम कर गया होगा
शबनम शकील
मिरा जीना गवाही दे रहा है
शबनम शकील
हम तो गवाह हैं कि ग़लत था लिखा गया
शबनम शकील
चलती रहती है तसलसुल से जुनूँ-ख़ेज़ हवा
शबनम शकील
लम्हों का पथराव है मुझ पर सदियों की यलग़ार
शबनम रूमानी
टूट के बादल फिर बरसा है
शबनम नक़वी
इतना एहसान और करता कौन
शबी फ़ारूक़ी
अपनी तलब का नाम डुबोने क्यूँ जाएँ मय-ख़ाने तक
शायर लखनवी
नग़्मा यूँ साज़ में तड़पा मिरी जाँ हो जैसे
शानुल हक़ हक़्क़ी
मोहब्बत ख़ार-ए-दामन बन के रुस्वा हो गई आख़िर
शानुल हक़ हक़्क़ी
इधर मौसम की ये ख़ुश-एहतिमामी
शानुल हक़ हक़्क़ी
हर-चंद कि साग़र की तरह जोश में रहिए
शानुल हक़ हक़्क़ी
ऐ दिल अब और कोई क़िस्सा-ए-दुनिया न सुना
शानुल हक़ हक़्क़ी
औरत
शाद आरफ़ी
शुऊर-ए-क़ैस ने सहरा में ख़ुद-कुशी कर ली
सीन शीन आलम
देखते हैं न ठहर जाते हैं
सीमान नवेद
अजीब शाम थी जब लौट कर मैं घर आया
सीमान नवेद
ज़ात की दीवार बीचों-बीच इक दर वा हुआ
सीमाब ज़फ़र
ज़रूर वक़्त ही कुछ चाल चल रहा होगा
सीमा शर्मा मेरठी
ज़र्रे ज़र्रे हैं अक्स के हर-सू
सीमा शर्मा मेरठी
सुनी न दश्त या दरिया की भी कभी मैं ने
सीमा शर्मा मेरठी
लैला का अगर मुझ को किरदार मिला होता
सीमा शर्मा मेरठी
हक़ीक़त ज़ीस्त की समझा नहीं है
सीमा शर्मा मेरठी
आसमाँ भी पुकारता है मुझे
सीमा शर्मा मेरठी
डिकलाइन
सीमा ग़ज़ल
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