देख Poetry (page 64)

ये शख़्स जो तुझे आधा दिखाई देता है

अज़हर अदीब

पत्ता हूँ आँधियों के मुक़ाबिल खड़ा हूँ मैं

अज़हर अदीब

दरीचों में चराग़ों की कमी महसूस होती है

अज़हर अदीब

देख क़िंदील रुख़-ए-यार की जानिब मत देख

अज़हर अब्बास

फेंका था हम पे जो कभी उस को उठा के देख

आज़ाद गुलाटी

देखने वाले मुझे मेरी नज़र से देख ले

आज़ाद गुलाटी

आज आईने में ख़ुद को देख कर याद आ गया

आज़ाद गुलाटी

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

मेरा तो नाम रेत के सागर पे नक़्श है

आज़ाद गुलाटी

मैं बिछड़ कर तुझ से तेरी रूह के पैकर में हूँ

आज़ाद गुलाटी

हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ

आज़ाद गुलाटी

आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए

आज़ाद गुलाटी

ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना

अय्यूब ख़ावर

उश्शाक़ बहुत हैं तिरे बीमार बहुत हैं

अय्यूब ख़ावर

तिलिस्म-ए-इस्म-ए-मोहब्बत है दरपय-ए-दर-ए-दिल

अय्यूब ख़ावर

कितना मुश्किल है

अतीक़ुल्लाह

जब भी तन्हाई के एहसास से घबराता हूँ

अतीक़ुल्लाह

चलो सुरंग से पहले गुज़र के देखा जाए

अतीक़ुल्लाह

वो बात जिस से ये डर था खुली तो जाँ लेगी

आतिफ़ ख़ान

ये तिरी ज़ुल्फ़ का कुंडल तो मुझे मार चला

अतहर शाह ख़ान जैदी

यक़ीन बरसों का इम्कान कुछ दिनों का हूँ

अतहर नासिक

पल-दो-पल है फिर ये सोना मिट्टी का

अतहर नासिक

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं

अतहर नफ़ीस

उड़ान से पहले

अतीया दाऊद

काश समझदार न बनूँ

अतीया दाऊद

मिरी मुश्किल अगर आसाँ बना देते तो अच्छा था

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

मिरी ज़िंदगी किसी मोड़ पर कभी आँसुओं से वफ़ा न दे

अतीक़ अंज़र

किसी के जिस्म-ओ-जाँ छलनी किसी के बाल-ओ-पर टूटे

अता आबिदी

शरारे

असरार-उल-हक़ मजाज़

नौ-जवान से

असरार-उल-हक़ मजाज़

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