दिल Poetry (page 148)

पागल औरत

सहबा अख़्तर

यूँ भी हुआ इक अर्से तक इक शे'र न मुझ से तमाम हुआ

सहबा अख़्तर

सवाल-ए-सुब्ह-ए-चमन ज़ुल्मत-ए-ख़िज़ाँ से उठा

सहबा अख़्तर

कुल जहाँ इक आईना है हुस्न की तहरीर का

सहबा अख़्तर

इस तरीक़े को अदावत में रवा रखता हूँ मैं

सहबा अख़्तर

दोहराऊँ क्या फ़साना-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल को

सहबा अख़्तर

असनाम-ए-माल-ओ-ज़र की परस्तिश सिखा गई

सहबा अख़्तर

असनाम-ए-माल-ओ-ज़र की परस्तिश सिखा गई

सहबा अख़्तर

आ जा अँधेरी रातें तन्हा बिता चुका हूँ

सहबा अख़्तर

मुँह से जो कुछ बोलो भय्या

सहर महमूद

कहना हो जो भी साफ़ कहो बे-झिजक कहो

सहर महमूद

हम दिल की निगाहों से जहाँ देख रहे हैं

सहर महमूद

हर घड़ी मुझ को बे-क़रार न कर

सहर महमूद

है ये सूरत ग़म के बस इज़हार की

सहर महमूद

है बाइस-ए-सुकून सुख़न-वर तुम्हारा नाम

सहर महमूद

दास्ताँ क्या थी और क्या बना दी गई

सहर महमूद

दर्द की सूरत में वो उम्दा सा तोहफ़ा दे गया

सहर महमूद

चमन में रह के भी क्यूँ दिल की वीरानी नहीं जाती

सहर महमूद

अँधेरे से ज़ियादा रौशनी तकलीफ़ देती है

सहर महमूद

न अब वो शिद्दत-ए-आवारगी न वहशत-ए-दिल

सहर अंसारी

तारीकियों का हिसाब

सहर अंसारी

क़ाबील का साया

सहर अंसारी

हिसाब-ए-शब

सहर अंसारी

विसाल-ओ-हिज्र से वाबस्ता तोहमतें भी गईं

सहर अंसारी

न किसी से करम की उम्मीद रखें न किसी के सितम का ख़याल करें

सहर अंसारी

महसूस क्यूँ न हो मुझे बेगानगी बहुत

सहर अंसारी

किसी भी ज़ख़्म का दिल पर असर न था कोई

सहर अंसारी

हम अहल-ए-ज़र्फ़ कि ग़म-ख़ाना-ए-हुनर में रहे

सहर अंसारी

हवस ओ वफ़ा की सियासतों में भी कामयाब नहीं रहा

सहर अंसारी

इक आस का धुँदला साया है इक पास का तपता सहरा है

सहर अंसारी

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