दिल Poetry (page 147)

शेर क्या है आह है या वाह है

साहिर देहल्वी

मिल-मिला के दोनों ने दिल को कर दिया बरबाद

साहिर देहल्वी

सर-ए-अर्श-ए-बरीं है ज़ेर-ए-पा-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना

साहिर देहल्वी

समद को सरापा सनम देखते हैं

साहिर देहल्वी

रुस्वा-ए-इश्क़ में तिरा शैदा कहें जिसे

साहिर देहल्वी

रुस्वा-ए-इश्क़ है तिरा शैदा कहें जिसे

साहिर देहल्वी

नूर-ए-ईमाँ सुर्मा-ए-चश्म-ए-दिल-ओ-जाँ कीजिए

साहिर देहल्वी

मस्त-ए-निगाह-ए-नाज़ का अरमाँ निकालिए

साहिर देहल्वी

काम इस दुनिया में आ कर हम ने क्या अच्छा किया

साहिर देहल्वी

जुनूँ के जोश में जिस ने मोहब्बत को हुनर जाना

साहिर देहल्वी

जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब

साहिर देहल्वी

जसद ने जान से पूछा कि क़ल्ब-ए-बे-रिया क्या है

साहिर देहल्वी

जला है किस क़दर दिल ज़ौक़-ए-काविश-हा-ए-मिज़्गाँ पर

साहिर देहल्वी

इस जिस्म की है पाँच अनासिर से बनावट

साहिर देहल्वी

हौसला वज्ह-ए-तपिश-हा-ए-दिल-ओ-जाँ न हुआ

साहिर देहल्वी

दिल को यकसूई ने दी तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ की सलाह

साहिर देहल्वी

दिल की तस्कीन को काफ़ी है परेशाँ होना

साहिर देहल्वी

दिल है बहर-ए-बे-कराँ दिल की उमंग

साहिर देहल्वी

दरमियान-ए-जिस्म-ओ-जाँ है इक अजब सूरत की आड़

साहिर देहल्वी

चश्म-ए-मस्त-ए-साक़ी से दिल हुआ ख़राब-आबाद

साहिर देहल्वी

चार उंसुर से बना है जिस्म-ए-पाक

साहिर देहल्वी

बुत-परस्ती के सनम-ख़ाने का आसार न तोड़

साहिर देहल्वी

पहले होता था बहुत अब कभी होता ही नहीं

साहिबा शहरयार

मुझ को वीरान सी रातों में जगाने वाले

साहिबा शहरयार

इक बर्फ़ का दरिया अंदर था

साहिबा शहरयार

सुख़न को तूल न दे अपनी एहतियाज बता

सहबा वहीद

ख़्वाब देखूँ कोई महताब लब-ए-बाम उतरे

सहबा वहीद

हर एक बंदिश-ए-ख़ुद-साख़्ता बयाँ से उठा

सहबा वहीद

शायद वो संग-दिल हो कभी माइल-ए-करम

सहबा अख़्तर

मैं उसे समझूँ न समझूँ दिल को होता है ज़रूर

सहबा अख़्तर

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