दिल Poetry (page 167)

किस के जल्वों ने दिखाई वादी-ए-उल्फ़त मुझे

रऊफ़ यासीन जलाली

इन आँखों में बसा कोई ज़ोहरा-जबीं है अब

रऊफ़ यासीन जलाली

चाक दामन भी हुआ चाक-ए-गरेबाँ की तरह

रऊफ़ यासीन जलाली

आज़ार-ए-दिल से रंग-ए-तबीअ'त बदल गया

रऊफ़ यासीन जलाली

उस का ख़याल आते ही मंज़र बदल गया

रउफ़ रज़ा

सब होत न होत से नथरी हुई आसान ग़ज़ल हूँ छा के सुनो

रउफ़ रज़ा

नाश्ते पर जिसे आज़ाद किया है मैं ने

रउफ़ रज़ा

कोई ज़ख़्म खुला तो सहने लगे कोई टीस उठी लहराने लगे

रउफ़ रज़ा

बहुत ख़ूबियाँ हैं हवस-कार दिल में

रउफ़ रज़ा

सिलसिले ये कैसे हैं टूट कर नहीं मिलते

रउफ़ ख़लिश

कितनी सदियों से लम्हों का लोबान जलता रहा

रउफ़ ख़लिश

वो ख़ुश-सुख़न तो किसी पैरवी से ख़ुश न हुआ

रऊफ़ ख़ैर

कोई भी ज़ोर ख़रीदार पर नहीं चलता

रऊफ़ ख़ैर

हम अगर रद्द-ए-अमल अपना दिखाने लग जाएँ

रऊफ़ ख़ैर

गिरफ़्तारी के सब हरबे शिकारी ले के निकला है

रऊफ़ ख़ैर

अब इस से पहले कि तन मन लहू लहू हो जाए

रऊफ़ ख़ैर

आँखों प अभी तोहमत-ए-बीनाई कहाँ है

रऊफ़ ख़ैर

लुत्फ़ ख़ुदी यही है कि शान-ए-बक़ा रहूँ

रतन पंडोरवी

ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई

रतन पंडोरवी

जुदा वो होते तो हम उन की जुस्तुजू करते

रतन पंडोरवी

सुब्ह-नुशूर क्यूँ मिरी आँखों में नूर आ गया

रसूल साक़ी

शौक़ से आए बुरा वक़्त अगर आता है

रसूल साक़ी

लाव-लश्कर जाह-ओ-हशमत है यहाँ

रसूल साक़ी

घर से निकल के आए हैं बाज़ार के लिए

रसूल साक़ी

शेवा-ए-ज़ब्त को रुस्वा दिल-ए-नाशाद न कर

रसूल जहाँ बेगम मख़फ़ी बदायूनी

कुछ हद भी ऐ फ़लक सितम-ए-ना-रवा की है

रसूल जहाँ बेगम मख़फ़ी बदायूनी

जोश पर रंग-ए-तरब देख के मयख़ाने का

रसूल जहाँ बेगम मख़फ़ी बदायूनी

साया सा इक ख़याल की पहनाइयों में था

रासिख़ इरफ़ानी

कितनी ठंडी थी हवा क़र्या-ए-बर्फ़ानी की

रासिख़ इरफ़ानी

खंडर में दफ़्न हुई हैं इमारतें क्या क्या

रासिख़ इरफ़ानी

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