दिल Poetry (page 168)

गर्म हर लम्हा लहू जिस्म के अंदर रखना

रासिख़ इरफ़ानी

तुम्हें ऐसा बे-रहम जाना न था

रासिख़ अज़ीमाबादी

शैख़-ए-हरम उस बुत का परस्तार हुआ है

रासिख़ अज़ीमाबादी

ममनूँ ही रहा उस बुत-ए-काफ़िर की जफ़ा का

रासिख़ अज़ीमाबादी

क्या करेगा जा के बैतुल्लाह तू

रासिख़ अज़ीमाबादी

ज़िंदगी थी ये तमाशा तो नहीं था पहले

राशिद तराज़

यक़ीं से फूटती है या गुमाँ से आती है

राशिद तराज़

किस की आँखों की हिदायत से मुझे देखता है

राशिद तराज़

ख़ेमा-ज़न कौन है आख़िर ये कनार-ए-दिल पर

राशिद तराज़

अपने बीमार सितारे का मुदावा होती

राशिद तराज़

ज़िक्र-ए-तूफ़ाँ भी अबस है मुतमइन है दिल मिरा

रशीद शाहजहाँपुरी

शम्अ' में सोज़ की वो ख़ू है न परवाने में

रशीद शाहजहाँपुरी

साक़ी-ए-रंगीं-अदा था बादा-ए-गुलफ़ाम था

रशीद शाहजहाँपुरी

साक़ी-ए-रंगीं-अदा था बादा-ए-गुलफ़ाम था

रशीद शाहजहाँपुरी

जिस को देखो एहतिसाब-ए-ज़ीस्त से ग़ाफ़िल है आज

रशीद शाहजहाँपुरी

ब-क़द्र-ए-हसरत-ए-दिल ज़ुल्म भी ढाना नहीं आता

रशीद शाहजहाँपुरी

ब-क़द्र-ए-हसरत-ए-दिल ज़ुल्म भी ढाना नहीं आता

रशीद शाहजहाँपुरी

आशियाने की बात करते हो

रशीद शाहजहाँपुरी

आँखों आँखों में मोहब्बत का पयाम आ ही गया

रशीद शाहजहाँपुरी

ये आँसू किस लिए रुकता नहीं है

राशिद राही

ये मोहब्बत का वार है साहब

राशिद क़य्यूम अनसर

दर जो खोला है कभी उस से शनासाई का

राशिद नूर

अब ज़ीस्त मिरे इम्कान में है

राशिद नूर

लूटा जाने वालों ने

राशिद मुफ़्ती

किस शय का सुराग़ दे रहा हूँ

राशिद मुफ़्ती

जो क़र्ज़ मुझ पे है वो बोझ उतारता जाऊँ

राशिद मुफ़्ती

अब क्या गिला कि रूह को खिलने नहीं दिया

राशिद मुफ़्ती

अजीब ख़्वाहिश

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

सफ़र से किस को मफ़र है लेकिन ये क्या कि बस रेग-ज़ार आएँ

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

इस तग-ओ-दौ ने आख़िरश मुझ को निढाल कर दिया

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

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