दिल Poetry (page 285)

यूँही रहा जो बुतों पर निसार दिल मेरा

बेखुद बदायुनी

शिकवा सुन कर जो मिज़ाज-ए-बुत-ए-बद-ख़ू बदला

बेखुद बदायुनी

साथ साथ अहल-ए-तमन्ना का वो मुज़्तर जाना

बेखुद बदायुनी

रक़ीबों का मुझ से गिला हो रहा है

बेखुद बदायुनी

पयाम ले के जो पैग़ाम-बर रवाना हुआ

बेखुद बदायुनी

क्यूँ मिरा हाल क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

बेखुद बदायुनी

कभी हया उन्हें आई कभी ग़ुरूर आया

बेखुद बदायुनी

जिस में सौदा नहीं वो सर ही नहीं

बेखुद बदायुनी

इस बज़्म में न होश रहेगा ज़रा मुझे

बेखुद बदायुनी

हासिल उस मह-लक़ा की दीद नहीं

बेखुद बदायुनी

गर्दिश-ए-चश्म-ए-यार ने मारा

बेखुद बदायुनी

दर्द-ए-दिल में कमी न हो जाए

बेखुद बदायुनी

आह करना दिल-ए-हज़ीं न कहीं

बेखुद बदायुनी

हर एक लहज़ा मिरी धड़कनों में चुभती थी

बेकल उत्साही

तमन्ना बन गई है माया-ए-इल्ज़ाम क्या होगा

बेकल उत्साही

रहीन-ए-आस रही है न महव-ए-यास रही

बेकल उत्साही

फ़स्ल-ए-गुल कब लुटी नहीं मालूम

बेकल उत्साही

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

बहज़ाद लखनवी

ऐ दिल की ख़लिश गर यूँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में

बहज़ाद लखनवी

तुम याद मुझे आ जाते हो

बहज़ाद लखनवी

तुम से शिकायत क्या करूँ

बहज़ाद लखनवी

यूँ तो जो चाहे यहाँ साहब-ए-महफ़िल हो जाए

बहज़ाद लखनवी

उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं

बहज़ाद लखनवी

तुझ पर मिरी मोहब्बत क़ुर्बान हो न जाए

बहज़ाद लखनवी

तिरे इश्क़ में ज़िंदगानी लुटा दी

बहज़ाद लखनवी

मोहब्बत मुस्तक़िल कैफ़-आफ़रीं मालूम होती है

बहज़ाद लखनवी

मसरूर भी हूँ ख़ुश भी हूँ लेकिन ख़ुशी नहीं

बहज़ाद लखनवी

लब पे है फ़रियाद अश्कों की रवानी हो चुकी

बहज़ाद लखनवी

क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ

बहज़ाद लखनवी

ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ

बहज़ाद लखनवी

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