दिल Poetry (page 283)

कब तलक चलना है यूँ ही हम-सफ़र से बात कर

भारत भूषण पन्त

कब तक गर्दिश में रहना है कुछ तो बता अय्याम मुझे

भारत भूषण पन्त

जुस्तुजू मेरी कहीं थी और मैं भटका कहीं

भारत भूषण पन्त

दानिस्ता जो हो न सके नादानी से हो जाता है

भारत भूषण पन्त

चाहतों के ख़्वाब की ताबीर थी बिल्कुल अलग

भारत भूषण पन्त

अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है

भारत भूषण पन्त

न मिला तिरा पता तो मुझे लोग क्या कहेंगे

बेताब लखनवी

तुम्हारी याद मेरा दिल ये दिनों चलते पुर्ज़े हैं

बेख़ुद देहलवी

तुम्हारे हाथ ख़ाली जेब ख़ाली ज़ुल्फ़ ख़ाली थी

बेख़ुद देहलवी

नज़र कहीं है मुख़ातब किसी से हैं दिल में

बेख़ुद देहलवी

नौ-गिरफ़्तार-ए-मोहब्बत हूँ वफ़ा मुझ में कहाँ

बेख़ुद देहलवी

मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद

बेख़ुद देहलवी

मिला के ख़ाक में सर्मा-ए-दिल-ए-'बेख़ुद'

बेख़ुद देहलवी

मौत आ रही है वादे पे या आ रहे हो तुम

बेख़ुद देहलवी

कोई इस तरह से मिलने का मज़ा मिलता है

बेख़ुद देहलवी

जवाब सोच के वो दिल में मुस्कुराते हैं

बेख़ुद देहलवी

अदाएँ देखने बैठे हो क्या आईने में अपनी

बेख़ुद देहलवी

वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी

बेख़ुद देहलवी

उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे

बेख़ुद देहलवी

तुम हमारे दिल-ए-शैदा को नहीं जानते क्या

बेख़ुद देहलवी

तेशे से कोई काम न फ़रहाद से हुआ

बेख़ुद देहलवी

शौक़ अपना आप मैं अपनी ज़बाँ से क्यूँ कहूँ

बेख़ुद देहलवी

शम-ए-मज़ार थी न कोई सोगवार था

बेख़ुद देहलवी

सब्र आता है जुदाई में न ख़्वाब आता है

बेख़ुद देहलवी

रात भर गर्दिश थी उन के पासबानों की तरह

बेख़ुद देहलवी

क़यामत है जो ऐसे पर दिल-ए-उम्मीद-वार आए

बेख़ुद देहलवी

न सही आप हमारे जो मुक़द्दर में नहीं

बेख़ुद देहलवी

न क्यूँ-कर नज़्र दिल होता न क्यूँ-कर दम मिरा जाता

बेख़ुद देहलवी

न अरमाँ बन के आते हैं न हसरत बन के आते हैं

बेख़ुद देहलवी

मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद

बेख़ुद देहलवी

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