दिल Poetry (page 282)

एक काँटे की खटक से दिल मिरा आबाद था

बिलाल अहमद

एक हालत थी मिरी और एक हालत दिल की थी

बिलाल अहमद

अजीब ढंग से तक़सीम-ए-कार की उस ने

बिलाल अहमद

नास्टैल्जिया

बिलाल अहमद

मुश्किल

बिलाल अहमद

दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989

बिलाल अहमद

धुँद

बिलाल अहमद

ज़मीं नई थी अनासिर की ख़ू बदलती थी

बिलाल अहमद

शफ़क़ से बाम-ए-फ़लक लाला-गूँ भी होता है

बिलाल अहमद

इक दिखावा रह गया बस दिल से वो चाहत गई

बिलाल अहमद

अजल की फूँक मिरे कान में सुनाई दी

बिलाल अहमद

कहाँ पहुँचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है

भवेश दिलशाद

मर गए हम पर न आए तुम ख़बर को ऐ सनम

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आ जाए न दिल आप का भी और किसी पर

भारतेंदु हरिश्चंद्र

रहे न एक भी बेदाद-गर सितम बाक़ी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

फिर आई फ़स्ल-ए-गुल फिर ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

नींद आती ही नहीं धड़के की बस आवाज़ से

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ख़याल-ए-नावक-ए-मिज़्गाँ में बस हम सर पटकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ग़ज़ब है सुर्मा दे कर आज वो बाहर निकलते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

गले मुझ को लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दिल मिरा तीर-ए-सितम-गर का निशाना हो गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

असीरान-ए-क़फ़स सेहन-ए-चमन को याद करते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

अजब जौबन है गुल पर आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी है

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

सच्चाइयों को बर-सर-ए-पैकार छोड़ कर

भारत भूषण पन्त

सब ने होंटों से लगा कर तोड़ डाला है मुझे

भारत भूषण पन्त

मुस्तक़िल रोने से दिल की बे-कली बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त

कभी सुकूँ कभी सब्र-ओ-क़रार टूटेगा

भारत भूषण पन्त

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