दिल Poetry (page 328)

इक तेरी बे-रुख़ी से ज़माना ख़फ़ा हुआ

अर्श सिद्दीक़ी

एक लम्हे को तुम मिले थे मगर

अर्श सिद्दीक़ी

संग-ए-दर उस का हर इक दर पे लगा मिलता है

अर्श सिद्दीक़ी

क्या साथ तिरा दूँ कि मैं इक मौज-ए-हवा हूँ

अर्श सिद्दीक़ी

हैराँ हूँ कि ये कौन सा दस्तूर-ए-वफ़ा है

अर्श सिद्दीक़ी

ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे

अर्श सिद्दीक़ी

बस एक ही कैफ़िय्यत-ए-दिल सुब्ह-ओ-मसा है

अर्श सिद्दीक़ी

बंद आँखों से न हुस्न-ए-शब का अंदाज़ा लगा

अर्श सिद्दीक़ी

बैठा हूँ वक़्फ़-ए-मातम-ए-हस्ती मिटा हुआ

अर्श सिद्दीक़ी

आँखों में कहीं उस के भी तूफ़ाँ तो नहीं था

अर्श सिद्दीक़ी

ये देखें राज़-ए-दिल अब कौन करता है अयाँ पहले

अर्श सहबाई

ये आइना था मगर ग़म की रहगुज़ार में था

अर्श सहबाई

नूर-अफ़शाँ है वो ज़ुल्मत में उजालों की तरह

अर्श सहबाई

मस्ती-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम से वाबस्ता रही

अर्श सहबाई

मैं हूँ ऐसे बिखरा सा

अर्श सहबाई

कश्ती-ए-दिल नज़्र-ए-तूफ़ाँ हो गई

अर्श सहबाई

दिल-ए-मुज़्तर से नालाँ हैं उधर वो भी इधर हम भी

अर्श सहबाई

इक रौशनी सी दिल में थी वो भी नहीं रही

अर्श मलसियानी

दिए जलाए उम्मीदों ने दिल के गिर्द बहुत

अर्श मलसियानी

मेरे प्यारे वतन

अर्श मलसियानी

मेरा वतन

अर्श मलसियानी

मैं क्यूँ भूल जाऊँ

अर्श मलसियानी

जश्न-ए-आज़ादी

अर्श मलसियानी

दीवाली

अर्श मलसियानी

ज़ख़्म-ए-दिल भी दिखा के देख लिया

अर्श मलसियानी

ये दौर-ए-ख़िरद है दौर-ए-जुनूँ इस दौर में जीना मुश्किल है

अर्श मलसियानी

वो ले के हौसला-ए-अज़्म-ए-बे-पनाह चले

अर्श मलसियानी

तू अगर दिल में एक बार आए

अर्श मलसियानी

पहला सा वो जुनून-ए-मोहब्बत नहीं रहा

अर्श मलसियानी

मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है

अर्श मलसियानी

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