दिल Poetry (page 38)

छुपा हूँ मैं सदा-ए-बाँसुली में

वली मोहम्मद वली

भड़के है दिल की आतिश तुझ नेह की हवा सूँ

वली मोहम्मद वली

अगर गुलशन तरफ़ वो नौ-ख़त-ए-रंगीं-अदा निकले

वली मोहम्मद वली

आशिक़ के मुख पे नैन के पानी को देख तूँ

वली मोहम्मद वली

आज सरसब्ज़ कोह ओ सहरा है

वली मोहम्मद वली

आज दिस्ता है हाल कुछ का कुछ

वली मोहम्मद वली

यूँ भी जीने के बहाने निकले

वली आलम शाहीन

सफ़र है ख़त्म मगर बे-घरी न जाएगी

वली आलम शाहीन

हुस्न पर बोझ हुए उस के ही वा'दे अब तो

वली आलम शाहीन

ग़म के रिश्तों को कभी तोड़ न देना 'वाली'

वाली आसी

कुछ दिन तिरा ख़याल तिरी आरज़ू रही

वाली आसी

जिन की यादें हैं अभी दिल में निशानी की तरह

वाली आसी

जी का जंजाल है इश्क़ मियाँ क़िस्सा ये तमाम करो 'वाली'

वाली आसी

हम जो दिन-रात ये इत्र-ए-दिल-ओ-जाँ खींचते हैं

वाली आसी

हम अपने-आप पे भी ज़ाहिर कभी दिल का हाल नहीं करते

वाली आसी

भूले-बिसरे हुए ग़म याद बहुत करता है

वाली आसी

ब-रंग-ए-नग़मा बिखर जाना चाहते हैं हम

वाली आसी

वो जो वीरान फिरा करता है

वकील अख़्तर

ज़िंदगी दस्त-ए-तह-ए-संग रही है बरसों

वकील अख़्तर

सहराओं में भी कोई हमराज़ गुलों का है

वाजिद सहरी

नादान होशियार बने जिन के रूप से

वाजिद सहरी

मत समझना कि सिर्फ़ तू है यहाँ

वाजिद अमीर

उल्फ़त ने तिरी हम को तो रक्खा न कहीं का

वाजिद अली शाह अख़्तर

सुन रक्खो उसे दिल का लगाना नहीं अच्छा

वाजिद अली शाह अख़्तर

नायाब है सुकून दिल-ए-बे-क़रार में

वाजिद अली शाह अख़्तर

मोहब्बत से बंदा बना लीजिएगा

वाजिद अली शाह अख़्तर

जा बैठते हो ग़ैरों में ग़ैरत नहीं आती

वाजिद अली शाह अख़्तर

हाल-ए-दिल ऐ बुतो ख़ुदा जाने

वाजिद अली शाह अख़्तर

ग़ुंचा-ए-दिल खिले जो चाहो तुम

वाजिद अली शाह अख़्तर

चाक चाक अपना गरेबाँ न हुआ था सो हुआ

वाजिद अली शाह अख़्तर

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