दिल Poetry (page 39)

बुतो ख़ुदा से डरो संग दिल सिवा न करो

वाजिद अली शाह अख़्तर

बरबाद न कर उस को ज़रा हाथ पे धर ला

वाजिद अली शाह अख़्तर

अल्लाह ऐ बुतो हमें दिखलाए लखनऊ

वाजिद अली शाह अख़्तर

मिरे अंदर कहीं पर खो गई है

वजीह सानी

क्या बताएँ उस के बिन कैसे ज़िंदगी कर ली

वजीह सानी

इक मोहब्बत का फ़ुसूँ था सो अभी बाक़ी है

वजीह सानी

अपने अंदाज़ में औरों से जुदा लगते हो

वजीह सानी

ना-मुरादी ही लिखी थी सो वो पूरी हो गई

वजद चुगताई

लगाएँ आग ही दिल में कि कुछ उजाला हो

वजद चुगताई

कौन ये रौशनी को समझाए

वजद चुगताई

फ़ज़ा में दाएरे बिखरे हुए हैं

वजद चुगताई

दुनिया अपनी मंज़िल पहुँची तुम घर में बेज़ार पड़े

वजद चुगताई

चाहतों की जो दिल को आदत है

वजद चुगताई

उठा लेने से तो दिल के रहा मैं

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

उस दिल-नशीं अदा का मतलब कभी न समझे

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

न वो पूछते हैं न कहता हूँ मैं

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

मिरे तो दिल में वही शौक़ है जो पहले था

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

कठिन है काम तो हिम्मत से काम ले ऐ दिल

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

छुपा न गोशा-नशीनी से राज़-ए-दिल 'वहशत'

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

आँख में जल्वा तिरा दिल में तिरी याद रहे

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़मीं रोई हमारे हाल पर और आसमाँ रोया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़ब्त की कोशिश है जान-ए-ना-तवाँ मुश्किल में है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

यही है इश्क़ की मुश्किल तो मुश्किल आसाँ है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

वफ़ा-ए-दोस्ताँ कैसी जफ़ा-ए-दुश्मनाँ कैसी

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

तीर-ए-नज़र ने ज़ुल्म को एहसाँ बना दिया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

सुरूर-अफ़्ज़ा हुई आख़िर शराब आहिस्ता आहिस्ता

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

शौक़ ने इशरत का सामाँ कर दिया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

शौक़ देता है मुझे पैग़ाम-ए-इश्क़

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

नालों से अगर मैं ने कभी काम लिया है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

नहीं मुमकिन लब-ए-आशिक़ से हर्फ़-ए-मुद्दआ निकले

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

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