दिल Poetry (page 383)

तुम कहाँ हो

अहमद आज़ाद

जो मेरे मरने का तमाशा नहीं देखना चाहती

अहमद आज़ाद

फिर कोई दूर हुआ जाता है

अहमद अता

बाग़-ए-हवस में कुछ नहीं दिल है तो ख़ुशनुमा है दिल

अहमद अता

ये मिरा वहम तो कुछ और सुना जाता है

अहमद अता

वो ज़माना है कि अब कुछ नहीं दीवाने में

अहमद अता

सफ़्हा-ए-ज़ीस्त जब पढूँगा तुम्हें

अहमद अता

पहले हम अश्क थे फिर दीदा-ए-नम-नाक हुए

अहमद अता

मिरे लिए तिरा होना अहम ज़ियादा है

अहमद अता

मैं तिरी मानता लेकिन जो मिरा दिल है ना

अहमद अता

कोई गुमाँ हूँ कोई यक़ीं हूँ कि मैं नहीं हूँ

अहमद अता

हमारी आँखें भी साहिब अजीब कितनी हैं

अहमद अता

इक अश्क बहा होगा

अहमद अता

ऐ मियाँ कौन ये कहता है मोहब्बत की है

अहमद अता

लगता है कि इस दिल में कोई क़ैद है 'अश्फ़ाक़'

अहमद अशफ़ाक़

सब जल गया जलते हुए ख़्वाबों के असर से

अहमद अशफ़ाक़

वो हस्ब-ए-वादा न आया तो आँख भर आई

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

उस ने किया है वादा-ए-फ़र्दा आने दो उस को आए तो

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

तख़्ता-ए-मश्क़-ए-सितम मुझ को बनाने वाला

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

नज़र बचा के वो हम से गुज़र गए चुप-चाप

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

मैं सोज़-ए-दरूँ अपना दिखा भी नहीं सकता

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

कौन है किस का ये पैग़ाम है क्या अर्ज़ करूँ

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

कर के असीर-ए-ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा मुझे

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

जब से में ने देखा है एक ख़ुशनुमा चेहरा

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

एहसास का वसीला-ए-इज़हार है ग़ज़ल

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

अम्न-ओ-सुल्ह-ओ-आश्ती हो जैसे बीमारी का नाम

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

आवाज़ का उस की ज़ेर-ओ-बम कुछ याद रहा कुछ भूल गए

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

मिरे एहसास के आतिश-फ़िशाँ का

आग़ाज़ बरनी

दूर से क्या मुस्कुरा कर देखना

आग़ाज़ बरनी

बे-हिसी इंसान का हासिल न हो

आग़ाज़ बरनी

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