दिल Poetry (page 74)

शमीम ज़ुल्फ़-ए-यार आए न आए

सिकंदर अली वज्द

रंग लाया दिवाना-पन मेरा

सिकंदर अली वज्द

कैफ़ जो रूह पे तारी है तुझे क्या मालूम

सिकंदर अली वज्द

जब वो मसरूर नज़र आता है

सिकंदर अली वज्द

होश ओ ख़िरद से बेगाना बन जा

सिकंदर अली वज्द

हज़ार नक़्स हैं मुझ में मिरे कमाल को देख

सिकंदर अली वज्द

हसीं यादों से ख़ल्वत अंजुमन है

सिकंदर अली वज्द

बयाबानों पे ज़िंदानों पे वीरानों पे क्या गुज़री

सिकंदर अली वज्द

तअ'ल्लुक़ की ना-जाएज़ तजावुज़ात

सिदरा सहर इमरान

वो सर्द धूप रेत समुंदर कहाँ गया

सिदरा सहर इमरान

असबाब-ए-हस्त रह में लुटाना पड़ा मुझे

सिदरा सहर इमरान

आसमाँ एक किनारे से उठा सकती हूँ

सिदरा सहर इमरान

वही रंग-ए-रुख़ पे मलाल था ये पता न था

सिद्दीक़ मुजीबी

शरीक-ए-ग़म कोई कब मो'तबर निकलता है

सिद्दीक़ मुजीबी

रात हुई फिर हम से इक नादानी थोड़ी सी

सिद्दीक़ मुजीबी

प्यासा जो मेरे ख़ूँ का हुआ था सो ख़्वाब था

सिद्दीक़ मुजीबी

नैरंग-ए-जहाँ रंग-ए-तमाशा है तो क्या है

सिद्दीक़ मुजीबी

मिरे चेहरे से ग़म आँखों से हैरानी न जाएगी

सिद्दीक़ मुजीबी

मौज-ए-ख़याल-ए-यार ग़म-ए-आसार आई है

सिद्दीक़ मुजीबी

होंटों पे सुख़न आँखों में नम भी नहीं अब के

सिद्दीक़ मुजीबी

एक बे-मंज़र उदासी चार-सू आँखों में है

सिद्दीक़ मुजीबी

दिल-ए-आईना-सामाँ पारा पारा कर के देखा जाए

सिद्दीक़ मुजीबी

बिखरती टूटती शब का सितारा रख लिया मैं ने

सिद्दीक़ मुजीबी

भूली-बिसरी बात है लेकिन अब तक भूल न पाए हम

सिद्दीक़ मुजीबी

अपने सीने को मिरे ज़ख़्मों से भरने वाली

सिद्दीक़ मुजीबी

अजब पागल है दिल कार-ए-जहाँ बानी में रहता है

सिद्दीक़ मुजीबी

शहर-ए-एहसास में ज़ख़्मों के ख़रीदार बहुत

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

झोंका नफ़स का मौजा-ए-सरसर लगा मुझे

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

जब ध्यान में वो चाँद सा पैकर उतर गया

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

हवा-ए-इश्क़ में शामिल हवस की लू ही रही

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

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